तनाव‌ ‌और‌ ‌मनोरोगों‌ ‌का‌ ‌मूल‌ ‌कारण‌

November 30, 2020 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कहते हैं कि तनाव गलत जीवन जीने का परिणाम है। पर यदि मेरा जीवन ही गलत है तो मुझे हर समय तनाव क्यों नहीं रहता?

आचार्य प्रशांत: यह हर समय मौजूद होता है नहीं तो कभी-कभार परिलक्षित क्यों होता? आपके घर में कभी-कभार साँप दिखाई देता है तो इसका मतलब क्या वो बाकी समय होता नहीं है? होता है, बस छुपा हुआ होता है इसलिए आपको दिखाई नहीं देता है। अगर आपका तनाव लगातार नहीं होता तो बीच-बीच में प्रकट कहाँ से हो जाता? कुछ नहीं से कुछ तो पैदा नहीं हो सकता न! कारण से ही कार्य आता है। कई बार कार्य बिल्कुल दृश्य रूप में प्रस्तुत होता है और कई बार जो कार्य होता है वो पीछे जाकर कारण में समाहित हो जाता है।

जो तनावग्रस्त है, उसकी ज़िन्दगी में तनाव, चिंता और मनोविकार लगातार है। बस वो कुछ मौकों पर प्रदर्शित हो जाता है। ये आपके लिए कोई खुशखबरी नहीं है कि आपका तनाव दिन में दो-चार घंटे ही प्रकट होता है। ऐसे समझ लीजिए, यदि आपका तनाव चौबीस घंटे बना रह गया होता तो आप तनाव से मुक्त हो गए होते। क्योंकि तब आप तनाव से आज़ाद हुए बिना जी नहीं पाएँगे। हम गलत जीवन जी ही इसलिए पाते हैं क्योंकि गलत जीवन का दुष्परिणाम लगातार अपना अनुभव नहीं कराता। अगर कोई ऐसी व्यवस्था हो पाती कि जो गलत जीवन जी रहे हैं, उनको उसी समय तत्काल अपनी गलती का फल मिल जाता तो गलतियाँ होनी ही बंद हो जातीं।

ये दुनिया का खेल, ये सब मायावी कार्यक्रम चल ही इसलिए रहा है क्योंकि गलती करके भी हम सुख पाते हैं। यही तो दुनिया की धुरी है, इसी के इर्द-गिर्द दुनिया नाच रही है। इसी चीज़ ने तो दुनिया का समीकरण पूरा बिगाड़ रखा है। अगर ऐसा होता कि तुम गलत काम करते और उसकी सज़ा तुरंत पा पाते लेकिन ऐसा नहीं होता। हमें और ज़्यादा भ्रमित करने के लिए एक चीज़ और होती है। आप बिल्कुल सही काम करके भी दुःख पा सकते हो। यदि ऐसी व्यवस्था होती कि सब सही काम करके अनिवार्यतः सुख ही पाते तो सब सही काम करते।

यहाँ पर कर्म और कर्मफल का खेल थोड़ा उलझा हुआ है, आदमी की समझ से बाहर का है। इसलिए कृष्ण ने कहा है, तुम कर्म और कर्मफल में मत उलझना बल्कि तुम कर्मफल की परवाह ही मत करना। कर्मफल कर्म से सीधे-सीधे आनुपातिक है, यह तुमको सदा प्रत्यक्ष नहीं दिखेगा। तुमने यदि कर्मफल के आधार पर कर्म चुनना शुरू कर दिया तो तुम बड़ी मुसीबत में फँस जाओगे क्योंकि गलत काम करने पर सुख मिल रहा है और सही काम करने पर दुःख मिल रहा है। अब तो तुम गलत कर्म का ही चयन करोगे। तुम देखोगे अपने चारों तरफ़ और कहोगे कि जो घटिया काम कर रहे हैं, केवल वही सुखी नज़र आ रहे हैं।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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