इज़्ज़त से जीना चाहते हो? || (2021)

August 17, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सामान्यत: तो हम ऐसे होते हैं कि अपने लिए कर्म करते हैं, अपने हित का सोचते हैं। और अपने लिए ना करने का चुनाव, यह करने वाले भी क्या हम ही होते हैं?

आचार्य प्रशांत: वो तो एक सुंदरता होती है जो तुमको असहाय कर देती है, एक नूर होता है जिसके आगे तुम हथियार डाल देते हो। पर सतर्क रहना क्योंकि वो प्राकृतिक भी हो सकता है। सच्चाई के आगे समर्पण कर देना एक बात है और किसी इंसान के रूप लावण्य के आगे घुटने टेक देना बिलकुल दूसरी बात है।

प्र: जैसे अपने विरुद्ध जाने के कई सामान्य उदाहरण भी होते हैं, कि कभी शरीर में आलस आया फिर भी हम उसके विरुद्ध चले गए, या कोई एडवेंचर स्पोर्ट कर लिया या इस तरह की चीज़ें कर लीं। तो वो भी क्या इसी दिशा में कुछ है कदम, पर निचले तल पर?

आचार्य: हाँ, वो इसी दिशा में कदम है, लेकिन उससे भी बेहतर है कि तुम अपने आप को किसी ऐसी चीज़ में झोंक दो जो तुमसे बड़े-से-बड़ा, ऊँचे-से-ऊँचा काम करा ले तुम्हारे ही खिलाफ़, और तुम्हें पता भी ना चले कि तुम अपने ख़िलाफ़ जा रहे हो। देखो सबसे निचले तल का काम हुआ अपने साथ जाना, उससे ऊँचा काम हुआ अपने ख़िलाफ़ जाना, और सबसे ऊँचा काम हुआ कि न अपने साथ हैं न अपने ख़िलाफ़ हैं; ये ‘अपना’ माने क्या होता है ये भूल ही गए।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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