तीन गलतियाँ जो सब करते हैं

February 1, 2021 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: सत्य को मायापति कहा गया है। समझते हैं: माया क्या? वो जो हमें प्रतीत होता है, जिसकी हस्ती के बारे में हमे पूरा विश्वास हो जाता है। पर कुछ ही देर बाद या किसी और जगह पर, किसी और स्थिति में हम पाते हैं कि वो जो बड़ा सच्चा मालूम पड़ता था या तो रहा नहीं या बदल गया। ऐसे को माया कहते हैं। गलत केंद्र से अनुपयुक्त उपकरणों के द्वारा छद्म विषयों को देखना और उनमें आस्था बैठा लेना ही माया है।

तीनतरफा गलती होती है। जो देख रहा है वो गलत है, द्रष्टा या कर्ता। वो गलत क्यों है? क्योंकि देखते समय, देखने के बिंदु पर उसका इरादा सत्य देखना नहीं है। उसका इरादा है इस प्रकार देखना कि देखने वाले की हस्ती बची रह जाए, कि देखने वाले का अस्तित्व अक्षुण्ण, सुरक्षित रह जाए। ये बेईमानी के साथ देखना हुआ। इस प्रकार के देखने में सत्यता, सत्यनिष्ठा बिल्कुल नहीं है। जो ऐसे देख रहा है वो देखना चाह कहाँ रहा है। वो तो दिखाई देती चीज़ को भी अनदेखा कर देना चाह रहा है, झुठला देना चाह रहा है। हम कह भी नहीं सकते कि वो देखने का इच्छुक है। वो तो अपने-आपको धोखा देने का इच्छुक है। तो पहली गलती हमसे ये होती है कि देखने वाला ही गलत है।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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