किसी भी शक्ति से बड़ा है तुम्हारा संकल्प

May 30, 2021 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: जैसे शरीर बढ़ता है खाने-पीने, हवा-पानी से, वैसे ही ये जो जीवात्मा है, मैं, अहम् भाव, अहंता, ये कैसे बढ़ती है? जो शरीर में गया वो शरीर ही बन जाता है न? उसके बाद अंतर नहीं कर पाओगे। सेब खाया, बताओ अब सेब कहाँ है? हर जगह है, आँख में भी है, बाल में भी है। जो पूरा शरीर है ये कोई-न-कोई चीज़ है जो कभी खाई थी, ठीक है न? तो शरीर में और शरीर द्वारा ग्रहण किए गए पदार्थ में अंतर करना संभव नहीं रह जाता। यही हाल अहम् का है।

अहम् में और अहम् ने जिस चीज़ को पकड़ रखा है, इन दोनों में अभेद की स्थिति पैदा हो जाती है। अहम् किसके लिए, किसके लिए—यह लगातार याद रखना ज़रूरी है; मैं भूल भी जाऊँ तो आप पूछा करिए—किसके लिए? अहम् के लिए। वो अपने-आपको इतना भुला देता है कि जिस चीज़ को पकड़ रखा है वही उसकी पहचान बन जाती है, ज़िन्दगी बन जाती है, अस्तित्व बन जाता है।

जैसे शरीर का अस्तित्व ही अब क्या है? सेब। अंदर गया, कभी बाहर था; अंदर गया नहीं कि शरीर ही बन गया वह। अब शरीर कैसे बोले कि, "सेब अलग है और मैं अलग हूँ"? कुछ-कुछ वैसे ही इशारे से बताया जा रहा है समझाने के लिए, कुछ-कुछ वैसे ही जितने विषय होते हैं वो अहम् का अस्तित्व ही बन जाते हैं, हस्ती बन जाते हैं।

उसकी प्रक्रिया क्या है? प्रक्रिया में ऋषि कह रहे हैं, "सबसे पहले आता है संकल्प।" और ये बात बड़ी ज़रूरी है, बड़ी प्यारी बात है यह। क्योंकि ये बात ज़िम्मेदारी की है।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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