पता है क्या चाहते हो?

March 31, 2021 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: जब भी तुम चाहते हो, चाहते उसी को हो; वो जो उच्चतम है, जिसको उपनिषद् सम्बोधित कर रहे हैं कभी रुद्र, कभी परमात्मा कहकर। लेकिन मन की हालत बड़ी बेचारगी की है, वो चाह कुछ ऐसा रहा है जो उसकी चाह के आगे का है।

छोटे बच्चे को सागर चाहिए। वो कह रहा है, "देखो, मैं अपना बड़ा-से-बड़ा पात्र खोल दूँगा सागर पाने के लिए। मुझे पता है सागर बड़ी चीज़ है, तो सागर के लिए मैं अपना जो सबसे विशाल पात्र खोल सकता हूँ वो खोल दूँगा।" और वो कौन-सा पात्र खोल देता है? अपनी दो हथेलियाँ। अंजुली फैलाकर खड़ा हो जाता है, कहता है, "ये देखो, मैंने कुछ बचाकर नहीं रखा। ये नहीं किया मैंने कि एक अंजुली रखी सामने और एक जेब में। मैं पूरा सागर माँग रहा हूँ तो मैं अपनी भी पूरी पात्रता के साथ माँग रहा हूँ।" उसको ये नहीं समझ आ रहा है कि सागर तुम्हारी हथेली में नहीं आएगा, तुम्हें सागर में डूब जाना पड़ेगा; बस इतनी-सी गलती हो रही है।

चाहत तो ठीक है, लेकिन चाहत के केंद्र में अहंकार बैठा हुआ है। ये नहीं कह रहा कि "मैं सागर को मिलूँ," कह रहा है, "मुझे सागर मिले।" जबकि अगर तुम कुछ चाह रहे हो जो वास्तव में चाहने लायक है तो वो तुम्हें नहीं मिल सकता; तुम्हें उसको मिलना पड़ेगा। कोई ऐसी चीज़ अगर तुमने माँग ली जो तुम्हें मिल गई, तो वो चीज़ तुम्हारी हथेलियों से भी छोटी हो गई न? उसको पाकर करोगे क्या? एक तो तुम छोटे, ऊपर से तुम्हारी हथेलियाँ नन्हीं; उसमें कुछ समा गया, इससे तुम्हें क्या तृप्ति मिलेगी?

बच्चा अपने तल पर बड़ा ईमानदार है, क्या बोल रहा है? "देखो, मेरे पास बड़े-से-बड़ा पात्र क्या था? ये मेरी हथेलियाँ। ये देखो, मैं पूरा तैयार हूँ। कोई मुझ पर बेईमानी का आरोप न लगाए; मैं पूरा खोलकर तैयार हो गया कि लाओ, सागर इसमें भर दो।" अब बच्चे की प्रशंसा करें या उसको झड़क दें, समझ में ही नहीं आता।

ऐसे ही हम हैं।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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