मुक्ति से भी मुक्ति

January 7, 2021 | आचार्य प्रशांत

क्व मोहः क्व च वा विश्व क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता ।

सर्वसंकल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥

~ अष्टावक्र गीता

( अध्याय १८ श्लोक १४ )

अनुवाद: जो महात्मा समस्त संकल्पों की सीमा पर विश्राम कर रहा है, उसके लिए अज्ञान कहां, विश्व कहां, ध्यान कहां और मुक्ति भी कहां?

आचार्य प्रशांत: मन अद्वैत को भी द्वैत के एक सिरे के ही तरह लेता है। मन अद्वैत का भी ध्यान तब करता है, अद्वैत की भी बात तब करता है जब उसे द्वैत से मुक्ति चाहिए होती है। तो द्वैत के तो दो सिरे होते ही हैं। और अगर उन दोनों सिरों वाले युग्म को हम एक इकाई मान लें, उस जोड़े को अगर हम एक इकाई मान लें तो मन उस एक इकाई के जोड़े की तरह अद्वैत को स्थापित कर देता है। तो द्वैत को अगर आप एक इकाई मानें तो मन कहता है द्वैत का द्वैत जोड़ा हुआ अद्वैत। ये उसकी लाचारगी भी है, ये उसकी प्रकृति भी है, यही उसकी सीमा है और यही उसका कष्ट है। इसके अलावा और वो कुछ कर नहीं सकता। तो अष्टावक्र हमें उस सब से भी मुक्ति दिला देना चाहते हैं जो हमारे लिए मुक्ति का पर्याय है।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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