बाहर भी वही, भीतर भी वही || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 21, 2022 | आचार्य प्रशांत

सहस्त्रशीर्षा पुरुष: सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥

वह परमात्मा सहस्त्र सिर वाला, सहस्त्र नेत्रों वाला और सहस्त्र पैरों वाला है। वह सम्पूर्ण जगत को सब ओर से घेर कर भी दस अंगुल बाहर (सम्पूर्ण रूप से) स्थित है अथवा नाभि से दस अंगुल ऊपर हृदयाकाश में स्थित है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १४)

आचार्य प्रशांत: जितनी आपकी सीमित चेतना है, सीमित हस्ती है, सीमित इन्द्रियाँ हैं, उन्हीं की पृष्ठभूमि में अनंत का चित्रण और वर्णन किया जाता है।

सहस्त्र माने हज़ार। वह हज़ार सिरों वाला, नेत्रों वाला, पैरों वाला है। आपका एक सिर है, एक प्राण है, एक बुद्धि है। उसके पास आपसे हज़ार गुनी ज़्यादा सामर्थ्य है। ये बात कही जा चुकी है पहले, फिर दोहराऊँगा ताकि बिलकुल स्पष्ट हो जाए। कोई इकाई नहीं है कहीं पर जो आपसे हज़ार गुनी ज़्यादा सामर्थ्यवान है। बिलकुल नहीं। ऐसा नहीं सोचना है।

हज़ार का आँकड़ा एकदम सांकेतिक है। कहीं नहीं कोई बैठा है जिसके हज़ार सिर हों, हज़ार गर्दनें हों, हज़ार हाथ या पाँव हों इत्यादि। चूँकि आप एक हैं तो आपसे एक बहुत दूर की भिन्नता दर्शाने के लिए सहस्त्र का सांकेतिक आँकड़ा लिया जाता है। तो एक माने छोटा, हज़ार माने बड़ा, बस इतनी सी बात है। एक माने छोटा या सीमित, और हज़ार माने एक से बहुत, बहुत दूर, अत्यंत भिन्न, अत्यंत दूरस्थ; इतनी दूर का कि आप हिम्मत ही ना कर पाएँ अपनी सीमित सामर्थ्य के साथ उसको पकड़ लेने की, पा लेने की, कल्पना करने की।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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