ये सब सच है क्या?

March 27, 2021 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: हम मानते हैं कि गति करने के लिए अगर हमारे पास हाथ-पाँव हैं तो वो गति करने में सहायक हो रहे हैं, ठीक है न? यही है न सोच हमारी? हम कहते हैं, “हमें गति करनी है और हाथ-पाँव हैं, इन्हीं के बूते तो हम यहाँ से वहाँ कहीं पहुँच पाते हैं।” ये सामान्य सोच है। इस सामान्य सोच के केंद्र में अहं बैठा है। वो अहं कह रहा है, “मेरा शरीर से तादात्म्य है और मैंने बहुत बढ़िया निर्णय किया है शरीर से तादात्म्य करके, क्योंकि देखो शरीर से तादात्म्य किया है तो अब मैं कह पाता हूँ ‘मेरे हाथ', ‘मेरे पाँव'। और ये हाथ-पाँव उपयोगी हैं न; मुझे यहाँ से वहाँ पहुँचना होता है तब हाथ-पाँव मेरे काम आते हैं। तो मैं बिलकुल सही हूँ, मैं बिलकुल सच हूँ।” यही तो अहं की अभिलाषा रहती है, कि वो अपने-आपको बोल दे कि मैं ही सत्य हूँ।

ये जो हाथ-पाँव हैं इन्हीं के कारण तो आप एक स्थान पर बँधे हो न? हाथ-पाँव माने शरीर। आपको आवश्यकता ही क्यों पड़ रही है एक जगह से दूसरी जगह जाने की? एकदम ज़रा मूलभूत सवालों को देखो; क्यों ज़रूरत पड़ रही है आपको यहाँ से वहाँ जाने की? क्योंकि शरीर एक समय पर एक ही जगह पर हो सकता है, ठीक है न? तो तभी फिर आपको समय का इस्तेमाल करके और हाथ-पाँव का श्रम लगाकर के एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ता है। अब आप इसी बात पर बड़े प्रसन्न हो रहे हो कि मेरे पास हाथ-पाँव हैं तो देखो मैं गति करके यहाँ से वहाँ पहुँच जाता हूँ; आप ये पूछ ही नहीं रहे कि गति करने की ज़रूरत क्यों पड़ी, ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि तुम किसी एक स्थान पर बंधक रहो ही नहीं?

हम बंधक ही तो हैं; आप किसी जगह पर हैं और वहाँ से हिल-डुल नहीं सकते, इसको बंधक होना ही कहते हैं न? एक तरह का कारागृह ही है न ये? शरीर और क्या करता है आपके साथ? कि तुम यहाँ पर हो तो तुम वहाँ नहीं हो सकते। बात समझ रहे हो? शरीर भी तो आपके ऊपर सीमा लगा रहा है न; और कारागृह भी आपके ऊपर सीमा लगाता है। हम लेकिन इसको ऐसे नहीं देखते हैं; हम सोचते हैं कि शरीर हमारी इच्छाएँ पूरी करने का माध्यम है, हम सोचते हैं कि हाथ-पाँव वो उपकरण हैं जिनका इस्तेमाल करके हम यहाँ से वहाँ पहुँच जाते हैं।

ऋषि कह रहे हैं, “ऐसे नहीं देखो। तुम ये देखो कि शरीर ही तुम्हारे लिए ये आवश्यक बना देता है कि तुम समय खर्च करो एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने पर; और जब दूसरी जगह पहुँच गए तुम, तो पहली जगह पर शेष नहीं रह गए। तुम माध्यम का प्रयोग करके बहुत प्रसन्न हो रहे हो, लेकिन तुम भूल रहे हो कि वो माध्यम ही तुम्हारी राह का रोड़ा है।“ क्या है माध्यम? शरीर माध्यम है। तुम प्रसन्न हो रहे हो कि तुम्हें माध्यम मिल गया अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए। जहाँ से ऋषि देख रहे हैं वो कह रहे हैं, “ये माध्यम तुम्हें लक्ष्य तक ले नहीं जा रहा, ये माध्यम ही लक्ष्य को तुमसे दूर किए दे रहा है।”

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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