दस जगहों पर भटक रहा है मन?

June 29, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मन सही समय पर सही निर्णय ले पाने में अक्षम है और तरह-तरह के लक्ष्यों में भटकता रहता है।

आचार्य प्रशांत: मन बाहर तरह-तरह के लक्ष्यों में इसीलिए भटकता रहता है क्योंकि मन को भीतर यह नहीं पता कि कौन सी एक चीज़ है जो उसको चाहिए। बाहर जितने भी लक्ष्य बनाते हो, बाहर जितनी भी चीज़ें आकर्षित करती हैं वह भीतर बैठे किसी चीज़ का प्रतिबिंब होती हैं।

अगर भीतरी तौर पर यह नहीं पता है कि कौन सी चीज़ जीवन में कीमती है तो बाहर भी कौन सी चीज़ कीमती है, क्या पाना चाहिए, किस लक्ष्य के पीछे समय, जीवन, ऊर्जा लगानी चाहिए यह स्पष्ट नहीं होगा। पर कुछ-न-कुछ तो करना ही है। मन, शरीर, ज़िंदगी यह सब गति के ही नाम हैं तो फिर उल-जलूल और अस्थाई लक्ष्यों के पीछे आदमी भागने लग जाता है। समझ में आ रही है बात?

पता नहीं है कि बाहर क्या चाहिए, किसकी तरफ बढ़े और चूँकि जीवन है तो एक जगह खड़े भी नहीं रह सकते तो फिर व्यक्ति किसी भी उटपटांग दिशा में बढ़ने लग जाता है और दिशा चूँकि मूल्यहीन है, व्यर्थ है तो उसकी तरफ बहुत देर तक चल भी नहीं पाता है। थोड़ी देर में रास्ते बदल कर, लक्ष्य बदल कर, मन बदल कर किसी और तरफ देखने लग जाता है, उधर को बड़ लेता है। और सवाल हम यही पूछते हैं कि हमें अपना लक्ष्य बाहर का पता नहीं चल रहा।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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