संयम और मर्यादा किनके लिए अनिवार्य हैं? || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

January 6, 2022 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: जैसे वृत्तियाँ होती हैं। वृत्ति होती है, फिर विचार का तल आता है। तो विचारों में कई बार फिर भी होता है कि विचार मन में घूम रहे होते हैं तो आप फिर भी उसे कई बार पकड़ पाते हो कि हाँ, अच्छा ऐसा कुछ चल रहा है और आप उसे ट्रेस बैक करने की कोशिश करते हो। लेकिन बहुत बार ऐसा होता है कि वृत्ति से सीधा कर्म ही निकल जाता है। विचार भी नहीं आता, बस उस तरीके से एक्ट करने लग जाते हो। और आपको पता भी नहीं चलता कि आप बहुत ही अचेतन तरीके से व्यवहार कर रहे हो और यह बार-बार देखने में आता भी है, खुद भी मतलब ऑब्जर्वेशन होता है पूरे दिन भर। तो इसका तरीका और क्या है बचने का?

आचार्य प्रशांत: फिर जो इसकी विधि होती है, वह होती है संयम और मर्यादा। चूँकि यह जो वृत्ति है, यह बहुत स्थूल है इसलिए इस पर सूक्ष्म विधियाँ काम नहीं करेंगी। जब वृत्ति इतनी स्थूल हो कि वह सीधे स्थूल कर्म में परिणित हो जाती हो तो उसमें फिर कोई सूक्ष्म विधि काम नहीं करती है। कर्म क्या होता है? स्थूल। तो यह वृत्ति के स्थूल होने की निशानी है कि वह विचार को भी अनुमति नहीं दे रही, कि वृत्ति विचार भी नहीं बन रही, सीधे कर्म बन जा रही है। भीतर से भावना का आवेग उठा और सीधे कोई कर्म कर डाला। तो यह स्थूल वृत्ति की निशानी है।


ap

आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

सुझाव