देह - हमारी साथी या बंधन? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 27, 2022 | आचार्य प्रशांत

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।
स वेति वेद्यं न च तस्यारित वेता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥

वह पुरम पुरुष हाथ-पैरों से रहित होकर भी वेगपूर्वक गमन करने वाला है। आँखों से रहित होकर भी देखता और कानों से रहित होकर भी सब सुनता है। वह जानने वाली चीज़ों को जानता है। उसे जानने वाला अन्य कोई नहीं है, उसे ज्ञानी जन महान, श्रेष्ठ आदि कहते हैं।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १९)

आचार्य प्रशांत: हाथ पाँव नहीं है, वेग पूर्वक गमन करता है। आँख नहीं है, सब देखता है। कान नहीं है, सब सुनता है; सब जानता भी है। यह बात क्या है? हाथ पाँव नहीं है, वेगपूर्वक गमन करता है, कैसे? हमारी सोच को चुनौती दी जा रही है, हमारे ढर्रे को ललकारा जा रहा है। हम मानते हैं कि गति करने के लिए अगर हमारे पास हाथ-पाँव हैं तो वो गति करने में सहायक हो रहे हैं, ठीक है न? यही है न सोच हमारी?

हम कहते हैं, "हमें गति करनी है और हाथ-पाँव हैं, इन्हीं के बूते तो हम यहाँ से वहाँ कहीं पहुँच पाते हैं।" यह सामान्य सोच है। इस सामान्य सोच के केंद्र में अहम् बैठा है, वो अहम् कह रहा है, "मेरा शरीर से तादात्म्य है और मैंने बहुत बढ़िया निर्णय किया है शरीर से तादात्म्य करके, क्योंकि देखो शरीर से तादात्म्य किया है तो अब मैं कह पाता हूँ 'मेरे हाथ, मेरे पाँव' और यह हाथ-पाँव उपयोगी हैं न। मुझे यहाँ से वहाँ पहुँचना होता है, हाथ-पाँव मेरे काम आते हैं। तो मैं बिलकुल सही हूँ, मैं बिलकुल सच हूँ।" और यही तो अहम् की अभिलाषा रहती है कि वो अपने-आपको बोल दे कि 'मैं सत्य हूँ'।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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