सभी परम के रूप हैं || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 24, 2022 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यदि सत्य पूर्ण है तो उसी स्रोत से जब चेतना आती है तो वह अपूर्ण क्यों होती है?

आचार्य प्रशांत: चेतना अपूर्ण होती नहीं है, चेतना के पास चुनाव होता है पूर्ण या अपूर्ण होने का। वास्तव में सत्य और चेतना अलग-अलग नहीं हैं। सत्य ही जब अपूर्ण होने के अपने विकल्प का चुनाव कर लेता है तो वो साधारण चेतना कहलाता है।

सत्य तो अद्वैत है, तो माने सत्य के अलावा तो कुछ हो नहीं सकता न। सत्य पाँच-सात होते हैं क्या? अभी बात करी थी, सत्य तो एक है; तो सत्य और चेतना दो कैसे हो सकते हैं? जब सत्य के अलावा किसी दूसरी इकाई का अस्तित्व ही नहीं हो सकता तो, 'सत्य और चेतना हैं', ये वाक्य ही ग़लत हो गया न? सत्य और, जहाँ तुमने कहा 'सत्य और', तहाँ बात गड़बड़ हो गई।

सत्य क्या कहलाता है? असंग-निसंग। जिसके साथ कभी किसी को जोड़ मत देना, जिसके बगल में कभी किसी को बैठा मत देना। 'सत्य और असत्य', ऐसा भी कभी मत कह देना। सत्य मात्र है।

तो चेतना भी क्या है? चेतना सत्य ही है, वो अपूर्ण नहीं है। सत्य ही जब इस विकल्प का उपयोग कर लेता है कि वो सीमित भी हो सकता है तो वो सीमित सांसारिक चेतना बन जाता है।

सत्य को कौन भ्रम में डालेगा? सत्य ही स्वयं को भ्रम में डाल सकता है। हम सत्य ही हैं जिसने स्वयं को मूर्ख बना रखा है।


ap

आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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