हमारी असली पहचान क्या? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 28, 2022 | आचार्य प्रशांत

य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानीशतः ईशनीभिः।
य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एताद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥

जो एक मायापति अपनी प्रभुतासंपन्न शक्तियों द्वारा संपूर्ण लोकों पर शासन करता है, जो अकेला ही सृष्टि की उत्पत्ति-विकास में समर्थ है, उस परम पुरुष को जो विद्वान जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १)

आचार्य प्रशांत: तीन बातें हैं यहाँ जिन्हें समझना जरूरी है। पहली बात, परमात्मा को या सत्य को 'मायापति' कहा गया है। दूसरी बात, उसे सब लोकों का शासक कहा गया है। और तीसरी बात, मात्र उसे ही सृष्टि की उत्पत्ति, विकास का कारण व नियंता माना गया है। संपूर्ण उपनिषद् वार्तामाला के दौरान हमने बार-बार कहा कि उपनिषद् संबोधित कर रहे हैं मन को, कि उनका प्रमुख उद्देश्य मन का उपचार करना है।

सत्य हाथ में आने वाली कोई वस्तु नहीं, सत्य ज्ञान के क्षेत्र का कोई सिद्धांत नहीं जो मन को सौंपा जा सके। तो निश्चित रूप से उपनिषदों का आशय सत्य को मन तक लाना नहीं हो सकता। सत्य और मन दो बहुत भिन्न आयाम में होते हैं। सत्य, सत्य है; मन सत्य नहीं है। जो सत्य नहीं है उस तक सत्य कैसे लाया जा सकता है? क्योंकि जो सत्य नहीं है वास्तव में उसका अस्तित्व ही नहीं है। जो है ही नहीं उस तक क्या उसको लाओगे जो है, जिसके अलावा कुछ और नहीं है।

तो यह धारणा हम बिलकुल अस्वीकृत कर दें कि उपनिषद् सत्य की बात कर रहे हैं। हम ऐसा अगर कभी कहें भी तो वह बात बस कामचलाऊ होगी, बहुत सटीक नहीं। ज़्यादा उचित होगा यह कहना कि उपनिषद् मन के उपचार के लिए हैं।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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