केवल प्रेम ही अहंकार की दवा है || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

January 12, 2022 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: अब देखिए यहाँ पर किन-किन पशुओं के नाम वर्णित हैं – मयूर है, गरुड़ है, वाराह है, सिंह है, गजराज है, गीदड़ियों की आवाज़ की हम बात कर ही चुके हैं। ये इतने भाँति-भाँति के पशुओं का उल्लेख हमें क्या बताता है? ये सब पशु हमारे भीतर की पशुता के अलग-अलग रूप हैं। तो पशुता तो हमारे भीतर रहेगी ही, यह शरीर ही पशु है। यह शरीर ही पशु है तो पशुता तो रहेगी ही, बस क्या करना है? उस पशुता को समर्पित कर देना है, उसको एक सही दिशा दे देनी है, उसको चैनलाइज कर देना है।

प्रश्नकर्ता: शुरू में आचार्य जी, एक अवलोकन है इस बात से कि आज पहली बार समझ में आया है कि समानता होती क्या है, जो आपने आख़िरी में बताया वह। और दूसरा प्रश्न यह है कि जब हमने पहले सुना था कि अपनी आइडेंटिटी (पहचान) को ड्रॉप (त्याग) करना है, उसको सही तरह चैनलाइज करना है। तो दोनों ही बात सही हैं?

आचार्य: यह अपनी आइडेंटिटी मिटाने की विधि है। आइडेंटिटी तो तुम्हें मिटानी है पर कैसे मिटाओगे? यह विधि है। सच जो है, वह महासागर है। तुम्हारी सब जो आइडेंटिटीज़ हैं, तुम्हारी जो पहचानें हैं, वे छोटी-छोटी नदियाँ हैं, उनको मिटाने का तरीका क्या है? सच में मिला दो।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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