मेरी मर्ज़ी मैं कुछ भी करूँ || (2021)

August 12, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इंसान में इतना आजकल अपने आप को प्रूव (साबित) करने का इतना जोश क्यों होता है, कि दुनिया को प्रूव करके दिखाना है कुछ? मतलब जैसे आजकल टीवी पर भी देखते हैं, तो मैं एक शो में गया था; उसका ऑडिशन देने गया था, एम.टीवी पर आता है, रोड़ीज़, उसमें पूछता है, "आप क्यों बनना चाहते हो?" आजकल नौजवान पीढ़ी सब बहुत देखते हैं ये एम.टीवी या ये। "तो क्यों बनना चाहते हो?" वहाँ लोग कहते हैं, "मुझे दुनिया को प्रूव करना है, सोसाइटी (समाज) को प्रूव करना है, ये करना है।" तो क्यों इतना होता है कि प्रूव करना है? कोई आपको कह दे कि, "तू छोटा है, तू नहीं कर सकता!" तो इतना गुस्सा आता है कि, "हाँ भाई तेरे को दिखा दूँगा!"

आचार्य प्रशांत: ज़ाहिर तो है न! जब तुमको खुद विश्वाश नहीं है अपने ऊपर, तो तुम चाहते हो कि दूसरे तुमको विश्वास दिलाएँ कि तुम ठीक हो। तुम्हें खुद पता हो कि तुम ठीक हो या ऊँचे हो या पूरे हो या मस्त हो, सुंदर हो, तो तुम दूसरों से नहीं जाओगे न सत्यापन माँगने, वैलीडेशन (सत्यापन) नहीं माँगोगे न फिर? पर खुद ही अंदर एक खोखलापन है तो जा-जाकर के दूसरों से चाहते हो कि वैलिडेशन मिल जाए, कि कोई दूसरा बोल दे कि “हाँ, हाँ बड़े अच्छे हो, बड़े प्यारे हो, वाह साहब आप तो शानदार हो, आपका जवाब नहीं।“ हकीक़त क्या है? तुम्हें अंदर-ही-अंदर पता है कि तुम एक नंबर के घोंचू हो। जो जितना घोंचू होगा, उसे उतना ज़्यादा ज़रूरत पड़ेगी दूसरों से तारीफ़ पाने की, कि दूसरे मुझे प्रूफ कर दें या अप्रूव (अनुमोदित) कर दें; जो भी।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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