एक ठसक, एक आग होनी चाहिए || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2020)

March 8, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता (प्र): मैं अपने जीवन को देखता हूँ तो मैं दुनिया की चीज़ों से ही घिरा हुआ पाता हूँ अपने-आपको। अगर मैं अपने मन को कभी काम से हटाता हूँ तो उसमें सिर्फ़ दुनिया ही घूम रही होती है; दुःख तो मिलता है उससे, तो व्यवहारिक तौर से इससे फिर निकला कैसे जाए?

आचार्य प्रशांत (आचार्य): ऊँचा माँगो न, ऊँचा।

देखो छोटे-मोटे सुख तो दुनिया में मिलते ही हैं, तभी तो दुनियादारी कायम रहती है। दुनिया से अगर तुम छोटी चीज़ माँगोगे तो दुनिया उसकी आपूर्ति कर देगी। दुनिया कोई बुरी जगह थोड़े ही है; कितने तरीके के सुख हैं दुनिया में, मिलते नहीं देखा लोगों को सुख? वो तो मिलते ही हैं दुनिया में। तो जो छोटी चीज़ माँग रहे हैं, दुनिया उनके लिए पर्याप्त है।

ऋषि होने का मतलब है कि “जो कुछ दुनिया दे सकती है, भाई! मुझे उससे कुछ अधिक चाहिए; अपन को ज़्यादा माँगता।“ अगर वो ज़्यादा नहीं माँगता, तो दुनिया ठीक है न? बोलो क्या चाहिए तुम्हें? छोटा-मोटा—एक ठीक-ठाक-सी पत्नी चाहिए, दो गोलू-मोलू बच्चे चाहिए, एक टू-थ्री बीएचके चाहिए, हर चार-छह महीने में एक छुट्टी, वेकेशन चाहिए; ये सब तो दुनिया में ही मिल जाएगा, इसके लिए तुम काहे को अध्यात्म की ओर जाओगे, ज़रूरत क्या है? इसीलिए आम आदमी ठीक ही करता है कि अध्यात्म की ओर नहीं जाता; या जाता भी है तो ऐसे ही मनोरंजन के लिए, कि हर छह महीने में कहीं एक यूट्यूब वीडियो देख लिया, या गए थे ऋषिकेश अध्यात्म के लिए, क्या कर आए? दो महीने का योगा *कोर्स * (पाठ्यक्रम) कर आए; तो ये बस…

दुनिया जो कुछ दे रही है वो कम नहीं होता है, निन्यानबे-प्रतिशत लोगों के लिए उतना काफ़ी है। भाँति-भाँति के रंगीन अनुभव मिलते हैं दुनिया में कि नहीं मिलते? ज़्यादातर लोगों के लिए उतना बहुत है। ऐसों पर कोई ज़बरदस्ती की नहीं जा सकती, यही कह सकते हो कि “काश! तुम्हारा समय जल्दी आए, काश कि तुम्हारा भ्रम जल्दी टूटे, काश कि तुम्हारे भीतर की प्यास जल्दी-से-जल्दी ज्वाला बन जाए।“

तुम अगर पाते हो—श्लोक कह रहे हैं कि “आत्मा मात्र में सुख है और संसार में बाकी हर जगह दुःख ही दुःख है।" ठीक है? तो तुमको अगर अभी दुनिया में सुख मिल रहा है तो इस बात को अपने ऊपर अपमान की तरह समझो, क्योंकि दुनिया में सुख है तो ज़रूर, पर कैसा है? छोटा-सा। अपमान की बात हो गई न? जैसे कोई आ जाए बहुत ज़बरदस्त, कि, "मैं तो सौ की गति से गेंद फेंकने वाला बॉलर (गेंदबाज़) हूँ", और उसको बोला जाए कि तुम बेबी ओवर कर आओ; ये कितने सम्मान की बात है, कि तुमने उसको बोल दिया कि तुम ओवर करो छोटा-सा?

तो वैसे ही अगर तुम पाओ कि तुम्हें दुनिया में सुख मिल रहा है तो अपने आप को धिक्कार लिया करो, कहा करो “मैं छोटा आदमी होऊँगा ज़रूर, जो इस छोटे से सुख से बिलकुल लार टपका दी मैंने। कि दुकानदार ने कहा- बीस प्रतिशत डिस्काउंट (छूट), और बिलकुल वहीं पर मैंने पूरी ज़मीन गीली कर दी।” ये लाज की, धिक्कार की बात है कि तुम्हें एक छोटे-से सुख से ही ख़रीद लिया गया।

समझ में आ रही है बात?

आत्मा सिर्फ उनके लिए है...

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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