हमारे भीतर देव कौन और दानव कौन? क्रोध का आध्यात्मिक अर्थ क्या? || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

January 7, 2022 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: द्वितीय अध्याय में जो युद्ध है, वो लम्बा चला, सौ सालों तक चला। उसमें देवताओं का नेतृत्व इंद्र के पास था और दानवों की ओर से महिषासुर था। सब देवता हारे और महिषासुर ही इंद्र बन बैठा। इंद्र माने राजा, जो जगत में अधिकार रखेगा, जो जगत की व्यवस्था चलाएगा, महिषासुर ही बन बैठा। और जो बाकी सब भी देवता थे, उनके भी अधिकार महिषासुर ने छीन लिए। चंद्र हैं, वरुण हैं, अग्नि हैं, मारुत हैं, इनके सबके जो अधिकार हैं, सब महिषासुर ने ले लिये, वही सम्राट हो गया।

तो कथा कहती है कि हारे हुए देवताओं ने ब्रह्मा जी को अपने आगे किया और जा करके पहुँचे विष्णु और शिव के पास और अपनी वहाँ पर विनती की, याचिका की। तो उनकी विनती सुनकर, सारा वृतांत सुनकर, विष्णु ने और शिव ने बड़ा क्रोध किया। और विष्णु के क्रोध से ही एक तेज़ उत्पन्न हुआ बड़ा भारी जिसने एक नारी रूप ले लिया।

उसके बाद सब देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियाँ उस रूप को प्रदान करीं। उस नारी के शरीर के जो अलग-अलग अंग थे, वो भी सब देवताओं द्वारा आए और तत्पश्चात सब देवताओं से ही उसको शस्त्र, अलंकार और आभूषण आदि भी मिले। तो एक तेजोमय स्वरुप, एक महानारी का, महादेवी का, इस तरीके से निर्मित हुआ या प्रकट हुआ।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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