महत्व देना और प्रेम करना

March 28, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: अभी हम ये उपनिषद् पढ़ रहे हैं और आपसे समझ रहे हैं, तो ये बार-बार आप बता रहे हैं कि जब पढ़ो ब्रह्म और परमात्मा के बारे में तो अपनी ओर देखो; लेकिन यदि कोई खुद से ही बैठकर पढ़ता है तो ये मुश्किल होता है। तो उस संदर्भ में, यदि किसी को बोला जाए कि “आप पढ़ें”, तो बिना किसी गुरु के सान्निध्य में उपनिषद् पढ़ने का कितना लाभ होगा?

आचार्य प्रशांत: उपनिषद् तो देखिए उपकरण हैं, और उनका आविष्कार खास तरीके से प्रयुक्त होने के लिए ही हुआ था। उपनिषद् तो लिखे भी बहुत बाद में गए, पहले तो परम्परा श्रुति की ही थी। तो ऐसा तो सोचा ही नहीं गया था कि कोई व्यक्ति उपनिषद् नामक ग्रन्थ लेकर के स्वाध्याय करेगा; स्वाध्याय करना माने खुद पढ़ना; ऐसा तो कल्पित नहीं था, पूरी बात ही यही थी कि गुरु के निर्देश तले ही इनको पढ़ा जाएगा।

और जब कोई समझाने वाला होता है तो एक ही श्लोक के, श्रोता के अनुसार वो अलग-अलग अर्थ दे पाता है; सुनने वाले लोग एक प्रकार के हैं तो एक तरीके से समझाया जाएगा, दूसरे तरीके के लोग हैं सुनने वाले तो दूसरे तरीके से समझाया जाएगा। तो सारी रचना ही इन ग्रंथों की इस तरीके से की गई थी कि एक जीवित चेतना शिष्य के सामने होगी, जो शिष्य को देख सकती है, समझ सकती है, उसकी जीवन-स्थिति से परिचित हो सकती है, और फिर उसकी जीवन-स्थिति के अनुसार वो श्लोकों का वर्णन और अर्थ कर सकती है।

स्वाध्याय में कुछ खतरा तो निश्चित रूप से है, लेकिन बिलकुल ही न पढ़ने से तो बेहतर है कि स्वाध्याय ही कर लो। अंततः तो सब कुछ अपने मन की शुद्धता पर निर्भर करता है। मन की शुद्धता से मेरा आशय है अभीष्ट की शुद्धता, इरादे की शुद्धता, नीयत साफ़ है कि नहीं। अगर नीयत साफ़ है, और आप उपनिषद् पढ़ने बैठें और न समझ में आए, तो आपको स्वयं ही स्पष्ट हो जाएगा कि आपको मार्गदर्शक की आवश्यकता है। और नीयत साफ़ नहीं हो, आप पढ़ने बैठें, न समझ में आए, तो या तो आप कह देंगे कि “ग्रंथ ही बेकार है, मुझे समझ में नहीं आता,” या फिर अपने मन-मुताबिक कोई ऊल-जलूल अर्थ श्लोक के ऊपर प्रक्षेपित कर देंगे। आप कहेंगे, "समझ में नहीं आ रहा, कोई बात नहीं। हम तुक्का लगा लेते है कि ऐसा ही कुछ अर्थ होगा।" अपने हिसाब से आप उसका कुछ अर्थ बैठा लेंगे, और संतुष्ट होकर, प्रसन्न होकर अगले श्लोक पर पहुँच जाऍंगे।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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