कचरे से मोह छोड़ना है वैराग्य; निरंतर सफाई है अभ्यास || आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण पर (2015)

April 19, 2017 | आचार्य प्रशांत

श्री भगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।

अनुवाद: हे महाबाहो, निश्चय ही मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, परंतु हे कुंतीपुत्र अर्जुन यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है।

~ श्रीमद् भगवद्गीता (अध्याय ६, श्लोक ३५)

आचार्य प्रशांत: तो प्रश्न ये है कि, "मन परिस्थितियों से विलग कैसे रह सकता है? आँखें खुलेंगी तो विश्व ही तो भाषित होगा। इसका अभ्यास कैसे किया जा सकता है?"

कृष्ण कह रहे हैं अर्जुन से कि “हे महाबाहो, मन कठिनता से वश में होने वाला है, परंतु अभ्यास और वैराग्य से ये वश में आ जाता है।”

अभ्यास और वैराग्य, इनसे किधर को इशारा है? वो अर्थ नहीं है, जो हमारी सामान्य बोलचाल की भाषा में होता है। हमारी सामान्य बोलचाल की भाषा में अभ्यास मात्र दोहराव का नाम है।

आध्यात्मिकता में अभ्यास का अर्थ होता है ध्यान में रहना, सतत जागरण।

और अगर सतत जागरण नहीं है, तो अभ्यास से सिर्फ़ मन पर और परतें चढ़ेंगी क्योंकि मन तो बनता ही है आदत से, प्रक्रियाओं से, दिनचर्याओं से।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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