वेदांत की एक मूल बात

March 27, 2021 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: देखो जो बिलकुल मूल, फंडामेंटल (मौलिक) बात है वेदांत की, उसको समझो। "सत्य एक है, वह अपनी मर्ज़ी से, अपनी लीला से, अपनी मुक्ति से, अपनी स्वेच्छा से अनेक रूपों में अभिव्यक्त होता है; कोई कारण नहीं है, अकारण ही, यूँ ही।" अभिव्यक्ति उसकी मौज है, इसी तरीके से अन-अभिव्यक्ति भी उसकी मौज है। प्रकट होना उसकी स्वेच्छा है, उसकी मुक्ति है; प्रकट होकर के पुनः अप्रकट हो जाना, ये भी उसकी स्वेच्छा की बात है।

कृष्ण कहते हैं अर्जुन से, "अर्जुन! इतने वर्षों में, इतने कल्पों, इतने कालों में कभी ऐसा नहीं रहा है कि ये राजा लोग न रहे हों जो आस-पास खड़े हैं कुरुक्षेत्र में, या तुम न रहे हो, या मैं न रहा हूँ।“ अच्छा, राजा लोग तो समझ में आता है कि पहले भी थे, अभी भी थे, क्यों? क्योंकि प्रकृति लहरें मारती रहती है, तो ये सब तो प्रकृति के हिस्से हैं। प्रकृति पुनर्जन्म ले रही है ये आशय है, कि ये सब तो हमेशा से थे, क्योंकि वो सब राजा लोग, ये सब क्या हैं? ये प्रकृति के गुणों के पुतले भर हैं; और गुणों के ये पुतले तो आज से पाँच-लाख साल पहले भी थे, आज भी हैं। तो ये राजा तब भी थे, ये आज भी हैं; तीन गुण वाले तब भी पाए जाते थे, तीन गुण वाले आज भी पाए जाते हैं।

ठीक है?

अर्जुन भी वही है तीन गुणों का पुतला मात्र; वो भी तब भी पाया जाता था, वो आज भी पाया जाता है। ये क्यों बोल देते हैं कृष्ण, कि, “अर्जुन तू भी सदा रहा है, हर काल में रहा है, और मैं भी हर काल में रहा हूँ”? कृष्ण को क्या पड़ी है बार-बार हर काल में रहने की भाई? अर्जुन तो मजबूर है हर काल में रहने को, कृष्ण क्यों लगातार पाए जा रहे हैं? "मौज है। हमारा ब्रह्मांड है, हम रहेंगे। हो सकता है रहें, हो सकता है न रहें, मन है, रहेंगे। और रहते इसलिए हैं कि भाई अर्जुन जैसा कोई हमेशा ही होता है, तो हम कहते हैं ठीक है, ये लड़का बढ़िया है, इसकी मदद कर देनी चाहिए।" तो इसलिए रहते हैं।

वो मजबूर, वो विवश होकर नहीं रह रहे, वो राजाओं की तरह नहीं रह रहे। ऐसे ही समझ लो कि सत्य से प्रकृति का निर्वाण है। क्या? मौज है। कोई विवशता नहीं, कोई प्रयोजन नहीं, नहीं भी रहें तो कोई कुछ बिगाड़ नहीं लेगा; कोई उत्तरदायित्व नहीं है, बस यूँ ही।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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