तुम कभी मरते नहीं || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)

April 18, 2022 | आचार्य प्रशांत

एको हि रूद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभि:।
प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा:॥

वह एक परमात्मा ही रूद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर स्थित है, वह सम्पूर्ण लोकों की रचना करके उनका रक्षक होकर प्रलयकाल में उन्हें समेट लेता है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् ( अध्याय ३, श्लोक २)

आचार्य प्रशांत: कुछ कहीं आना नहीं, कुछ कहीं जाना नहीं, जो है वास्तव में वो तो रहता-ही-रहता है। एक व्यक्ति छोड़ दो, एक जगह छोड़ दो, एक ग्रह छोड़ दो, एक आकाश गंगा छोड़ दो। पूरा-का-पूरा ब्रह्मांड भी अगर अभी विलुप्त हो जाए, तो भी सत्य पर खरोंच तक नहीं आनी है।

अस्तित्व आते जाते रहते हैं, न जाने कितने अस्तित्वों को श्रंखलाबद्ध रूप से अनअस्तित्व में बदलते देखा है काल की धारा ने। सत्य कालातीत है, वो अक्षुण्ण रहा है, उसे कौन बदलेगा। क्यों? क्योंकि बदली तो वो चीज़ जाएगी न जो चीज़ हो, बदला तो वो जाएगा न जिसकी कोई हस्ती हो, बदला तो वो जाएगा न जो संसार के भीतर हो; संसार के भीतर होता तो अन्य संसारी वस्तुओं की तरह उसको भी विलुप्ति का खतरा होता।

बड़े-से-बड़ा भय अब तुम्हें क्या सताएगा जब तुम्हें यह भय भी नहीं रहा कि पूरा ये ब्रह्मांड ही नहीं रहा तो मेरा क्या होगा।

सत्य का मतलब होता है ऐसी जगह अवस्थित हो जाना कि तुम्हारे आसपास सब कुछ भस्मीभूत भी हो जाए, तो भी तुम्हें किंचित अंतर ना पड़े केंद्र पर। बाहर-बाहर व्यवहार के चलते, करुणा के चलते, धर्म के चलते, तुम हर तरीके से अपना दायित्व निभाओगे। दायित्व निभाओगे पर निष्काम भाव से।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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