कर्ताभाव से जुड़े भ्रम || (2021)

September 8, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम स्वयं को कर्ता मानें या नहीं?

आचार्य प्रशांत: कर्ता तुम हो, लगातार हो, तुम्हीं हो, कोई और नहीं है। आम आदमी जिस स्थिति पर बैठा है उसके लिए बहुत ज़रूरी है कि वो लगातार खुद को ही कर्ता माने। आम आदमी के लिए बोल रहा हूँ, तात्विक या पारमार्थिक बात नहीं कर रहा हूँ अभी। अभी कह रहा हूँ जो हमारे लिए उपयोगी बात है। उपयोगी यही है कि हम स्वयं को ही कर्ता मानें; "हमने ही किया है।" क्योंकि अगर तुम ये नहीं मानोगे कि तुमने किया है तो तुम कह रहे हो कि, "मेरे पास फिर करने का अधिकार ही नहीं है।" और अगर तुम्हारे पास करने का अधिकार नहीं है तो फिर तुम सही चुनाव भी कैसे करोगे? फिर तो जैसी ज़िंदगी चल रही है वैसी ही चलती रहेगी न? और ज़िंदगी को यथावत चलाते रहने के लिए तुम्हें एक बहाना मिल जाएगा, क्या? "मैंने थोड़े ही करा है। ये किसी भगवान ने, किसी करतार ने करा है। असली कर्ता तो कोई और है, मैं थोड़े ही हूँ असली कर्ता।"

तो अभी सवाल ये नहीं है कि असली कर्ता कौन है, अभी सवाल ये है कि तुम मानते क्या आए हो आज तक। तुम आज तक यही मानते आए हो न कि तुम ही करते हो। तो जब हमने ये माना है कि हम ही करते हैं और ये मानकर कि हम ही करते हैं, हमने सारे उल्टे-पुल्टे काम करे हैं तो अब हम पर ही ज़िम्मेदारी है कि हमने जो फैलाया है उसको समेटें भी। वरना यह बात बड़ी बेईमानी की और ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हो जाएगी कि सब गलतियाँ और गड़बड़ियाँ करते वक़्त तो हम बने हुए थे कर्ता और जब उनका फल भोगने का समय आया है और जब उनका सुधार करने का समय आया है तब हम कहें, "मैंने थोड़े ही किया, मैं थोड़े ही कर्ता हूँ।" जैसे कि जाकर रेस्टोरेंट में खाना खाएँ और बोलें कि "मैंने थोड़े ही खाया, तो बिल मैं क्यों दूँ? जो करता है भगवान करता है, तो मुँह भी उसी ने चलाया, उसी के पेट में गया।"

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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