पैसे नहीं कमाने?

April 25, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: ऐसे जीवन में मौके आते हैं जैसे ग्रेजुएशन (स्नातक) के बाद आया था वैसे ही अभी भी चुनाव करने की स्थिति में हूँ। एक काम से सम्बंधित है कि कुछ काम करना है लेकिन बहुत ज़्यादा स्पष्ट नहीं है, एक आहट है हल्की सी, लेकिन और कोई मुझे ऑप्शन (विकल्प) या चुनाव मुझे दिखते नहीं हैं। ऐसा लगता है कि इस दिशा में जाऊँगा तो जो करना चाहता हूँ वो कर पाऊँगा। तो प्रश्न ये है कि पैसे को ध्यान में रख कर मैं कोई काम नहीं कर पाता या पैसे को सामने रख कर मैं कोई काम नहीं कर सकता?

आचार्य प्रशांत: पैसे को सामने रख कर मत करो काम लेकिन पैसा फ़िर किसी और से भी मत ले लेना। ये बहुत अच्छी बात है और इस बात में बहादुरी जैसी भी लगती है कि, "भई मैं पैसे की ओर नहीं देखता", ठीक है ये तो होना चाहिए। लेकिन पैसे की और नहीं देखता का अर्थ ये मत बना लेना कि, "मैं पैसे नहीं कमाता, मैं नहीं देखता पैसे की ओर, मैं नहीं कमाता और अपने खर्चों के लिए पिताजी से ले लेता हूँ।" ये तो बड़ा विकृत अर्थ हो जायेगा न। तुम्हारे जो भी सलाहकार हैं जब उन्होंने तुमसे कहा होगा कि पैसे का ख़्याल रखो तो शायद इस अर्थ में कहा होगा कि खुद नहीं कमाओगे तो किसी और से लोगे, जिससे लोगे उसके सामने झुकना पड़ेगा। कोई मुफ़्त में नहीं दे देता। तो आप बेशक पैसे को मन का, जीवन का केन्द्र न बना लें लेकिन इतना तो कमाएँ न कि पैसे के लिए हाथ न फैलाना पड़े।

और पैसे के लिए फिर अगर हाथ फैलाओ तो अपरिचितों के आगे फैलाओ जैसे एक भिक्षु करता है। वो जब जाकर किसी से खाना लेता है तो उसकी कोई शर्त मानकर नहीं लेता है उससे खाना। जब वो भिक्षा लेता है तो आप उसे स्वेच्छा से कुछ दे देते हैं। लेकिन अगर आप उस से ये कहेंगे कि, "मैं तुम्हें दे रहा हूँ बदले में तुम मेरी फलाना शर्त मानो", तो वो आपका दिया लेगा ही नहीं। तो आपको अगर माँगना ही है तो अपरिचितों से माँगें।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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