सुख मन को क्यों भाता है? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 23, 2022 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पहले कहा कि चेतना को पूर्णता चाहिए यानि सत्य चाहिए, वो बिंदु चाहिए। लेकिन चेतना छली जाती है, यानि कि सुख से छली जाती है एक तरह से। तो उस सुख में ऐसा क्या है जो सत्य जैसा प्रतीत होता है?

आचार्य प्रशांत: दुःख का अभाव। मुक्ति में और सुख में जो एक चीज़ साझी है वो है दुःख की अनुभूति की अनुपस्थिति। मुक्ति में भी दुःख नहीं है और सुख में भी दुःख नहीं है, लेकिन अंतर बड़े हैं। अंतर ये है कि मुक्ति में दुःख और सुख दोनों से मुक्ति है।

मुक्ति में दुःख और सुख दोनों से पूर्ण और सतत मुक्ति है। सुख में कुछ समय के लिए दुःख की अनुभूति भर स्थगित हो जाती है।

जैसे सिक्के का जब आप एक चेहरा देखें तो उतनी देर के लिए सिक्के के दूसरे चेहरे का अनुभव स्थगित हो जाता है, पर वो चेहरा कहीं चला नहीं गया। कितनी देर तक आप सिक्के का एक ही चेहरा देखते रहेंगे? और सिक्के के एक चेहरे से आसक्त होने के कारण सिक्के को आप जितना अपने निकट रखेंगे, वास्तव में आपने सिक्के के दूसरे चेहरे को भी अपने उतने ही निकट बुला लिया है। सुख की ये बात है, वह दुःख को हमेशा अपने साथ रखता है।

हमारी दृष्टि अगर ऐसी होती कि वो एक साथ सिक्के के दोनों पहलुओं को देख पाती तो सुख हमें छल नहीं पाता। पर ये इंद्रियों का धोखा है, ये अनुभव लेने वाले मन की असमर्थता है कि वो सिक्के के एक ही पहलू को देख पाता है, उसका अनुभव ले पाता है। वो ठगा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे हम ठगे जाते हैं जब कोई किसी दीवार के पीछे छुप गया हो। आपके पास वो नज़र ही नहीं है जो दीवार के पार देख पाए, है न? तो ये हमारे भौतिक अस्तित्व की सीमा है। यही तो हमारा मूल दुःख है कि हमारी आँखें, हमारे कान और हमारा मन कभी पूरी बात जान ही नहीं पाते। सैद्धान्तिक या दार्शनिक तौर पर छोड़ दो, रोज़मर्रा के भौतिक जीवन में भी हमें पूरी बात नहीं पता चलती।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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