प्रकृति माँ है, पत्नी नहीं; नमन करो, भोग नहीं || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

January 10, 2022 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रसंग में बताया गया है कि देवताओं ने बहुत लंबे समय तक सुख से राज्य किया, फिर उनके ऊपर दु:ख आया, तब जाकर उन्होंने देवी की स्तुति की। फिर आपने यह भी बताया कि धूल को लगातार साफ़ करते रहना होता है। हमारे साथ भी ऐसा ही होता है कि जब दु:ख आता है, तभी हम लोग याद करते हैं। जब सामान्य चल रहा होता है, सब कुछ सही होता है, तब ऐसा नहीं लगता कि धूल साफ़ करनी चाहिए, और फिर जब धूल हद से ज़्यादा बढ़ जाती है, तभी साफ़ करते हैं। तो क्या यह ऐसे ही होता है या हम ध्यान रख सकते हैं इसका?

आचार्य प्रशांत: देवी ही इसका कारण हैं। देवी के प्रति अज्ञान भी देवी का ही कार्य है। आप क्यों भूल जाते हो देवी को? उस भूल का कारण भी स्वयं देवी हैं। प्रकृति, देवी माने प्रकृति, प्रकृति में ही ये निहित है कि आप इस तथ्य को भूल जाओगे कि यह सब कुछ प्राकृतिक अर्थात क्षणभंगुर मात्र है। इसे थोड़ा गौर से समझिए, फिर से दोहराऊँगा।

यह बात प्रकृति में ही निहित है कि आप भूल जाओगे कि वह सब कुछ जिस पर आप इतरा रहे हो, जिससे आप संयुक्त हो गए हो, जिसको आप बचाना चाहते हो, जिसको आप मूल्य दे बैठे हो, जिसको आप अमर ही समझने लग गए हो, जिसको आप सत्य ही समझने लग गए हो, वो सब कुछ प्राकृतिक है। प्रकृति ही आपसे यह भुलवा देती है कि आप जिस बेहोशी के समुद्र में गोते मार रहे हो, वो प्राकृतिक है, वास्तविक नहीं। वास्तविक और प्राकृतिक में अंतर समझते हो? अध्यात्म की भाषा में वस्तु मात्र सत्य को कहा जाता है, वस्तु माने जो है, जो है। तो वास्तविक मात्र सत्य होता है।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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