दो पल का उत्साह नहीं, लंबी पारी चाहिए

May 2, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं आपको दस महीने से सुन रहा हूँ, और मुझमें बहुत परिवर्तन आया है। पहले मेरा शरीर बहुत दुर्बल था, साइनस (नाक की एक बीमारी) की समस्या थी। मैंने पिछले पाँच वर्षों में किसी भी प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा या कार्यक्रम में भाग नहीं लिया क्योंकि साइनस से मुझे बहुत डर लगता था। लेकिन आपके शरीर संबंधित सूत्रों का पालन करने के पश्चात मुझे बहुत राहत मिली, और मैं बाहर निकला। और जो भी काम अब आता है, मैं उसे करता हूँ। साइनस को केंद्र में रखकर कोई भी निर्णय नहीं लेता हूँ। पिछले दो महीने से मैं मार्शल आर्ट्स की कक्षा से भी जुड़ा हूँ और उसमें ग्रीनब्लैट हाँसिल किया है।

आपसे मिलने के बाद मेरा मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी बहुत सारा परिवर्तन हुआ है। एकाग्रता बहुत बढ़ी है, और जीवन को बुद्धि के अनुसार नहीं बल्कि सूत्रों के अनुसार जीना चाहिए, इस निष्कर्ष पर मैं पहुँचा हूँ। इसके लिए मैं आपका बहुत धन्यवाद करता हूँ। आचार्य जी, मैं चाहता हूँ कि आपके साथ रहकर, संस्था में रहकर कुछ सीख सकूँ और कुछ सहयोग कर सकूँ। कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: (स्वयंसेवकों की तरफ इशारा करते हुए) मुझे नहीं लगता है आज किसी ने खाना खाया यहाँ पर। नई जगह है, और कल रात सब देर तक जगे हुए थे। जवान लोग हैं, बीच (समुद्र तट) पर घूम रहे थे, खा रहे थे, पी रहे थे। आज उठे हैं, उसके बाद से तैयारियाँ ही कर रहे हैं। देखने में ऐसा ही लग रहा होगा कि छोटी-मोटी तैयारियाँ हैं, पर गोआ है, भाई। टेबल क्लॉथ (मेज़पोश) भी इधर-उधर आसानी से नहीं मिलता, जाना पड़ता है। बैठे हैं मज़े में, कोई खाने-पीने की तो सोच भी नहीं रहा होगा; ऐसे ही, उदाहरण आया, तो बोल दिया।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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