कल्पना, और कल्पना से आगे || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2020)

March 9, 2021 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: जितनी दूर तक तुम्हारी कल्पना जा सकती है, (ब्रह्म) उससे आगे का है; और उसके आगे का हमें कुछ चाहिए, क्योंकि कल्पना जितनी भी दूर तक जाती है, अपने साथ कचरा ही लेकर वापस आती है। ब्रह्म सत्य हो न हो, हमारे लिए आवश्यक ज़रूर है, क्योंकि ब्रह्म के अतिरिक्त जो कुछ है वो तो काम आता दिख नहीं रहा; और ब्रह्म सिर्फ़ उन्हीं के लिए है जिन्हें ब्रह्म के अतिरिक्त जो कुछ है वो काम आता न दिख रहा हो। ये बात समझिएगा अच्छे से।

अगर आपको संतुष्टि वहीं मिल गई है जहाँ तक आपकी कल्पना जाती है, उसी क्षेत्र में आपको मिल गई संतुष्टि, तो आपको कल्पना का फिर उल्लंघन करने की ज़रूरत क्या है? फिर ‘अणोरणीयान्*’ (सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद) की आवश्यकता क्या है? अणु तक तो आपकी कल्पना जा रही थी न; अणु माने समझ लो पदार्थ का वो छोटे-से-छोटा टुकड़ा जो आदमी की कल्पना में, आदमी के सिद्धांतों में आ सकता है। और महत् समझ लो समूचे अंतरिक्ष का विस्तार; वो अधिकतम है जिसकी आदमी कल्पना कर सकता है। अगर इसी विस्तार में, अगर इसी क्षेत्र में, अगर इसी *स्पेक्ट्रम ( वर्ण-क्रम) में आपको शान्ति मिल ही गई, तो ब्रह्म का क्या करना है? जो चाहते थे वो यहीं मिल गया।

ब्रह्म सिर्फ़ उनके लिए है जिनको अणु के भीतर भी खोज लेने के बावजूद चैन न मिले।

हम तो अधिक-से-अधिक यही कहते हैं न, “चप्पा-चप्पा छान मारेंगे”? अब चप्पा-चप्पा छानने में यही मतलब है कि यहाँ-वहाँ, कोने-कतरे, हर जगह देख लिया। खोजी ऐसा चाहिए जो एक-एक अणु, एक-एक एटम के भीतर भी घुसकर के खोज आए, कि, “कहीं यहाँ तो सत्य नहीं छुपा, कहीं यहाँ तो वो नहीं है जिससे मुझे शान्ति मिलेगी?” और वो वहाँ भी खोज ले और उसके बाद कहे, “नहीं मिला;” उसको मिलता है। ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, समझो। यूँ ही जो सस्ता विश्वास कर ले, जो ऐसी ही कही-सुनी धारणा पर चलता हो बस; उसके लिए नहीं है। पक्का अन्वेषक चाहिए, जो अणु के भीतर घुसकर खोज लाया है, और जो बिल्कुल बाहर तक निकल गया है। वो कह रहा है, “बताओ कहाँ है? बात क्या है? सच्चाई क्या है? जहाँ कहीं भी पदार्थ है मैं पूरा उसको जानना चाहूँगा।" न्यूक्लिअर-साइंस (नाभिकीय – विज्ञान) से लेकर के कॉस्मोलॉजी (ब्रह्मांड- विज्ञान) तक, सब एकसाथ शामिल हो गया इसमें।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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