जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पर गुमनाम मुद्दे

March 19, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, बचपन से ऐसी शिक्षा दी जाती है कि बहुत पढ़ो, बहुत कमाओ। नौकरी-छोकरी, यही सिखाया जाता है। और फिर अभी जब पैसा कमाते हैं, तब एक परिस्थिति आती है कि सब सुख हैं, लेकिन आनंद नहीं है। तो अब सत्य कहाँ? सत्य की ओर कैसे जाएँ? अभी हम बीच में हैं, तो क्या करें?

आचार्य प्रशांत: बहुत विस्तृत सवाल है, "क्या करें?" यही पहला सवाल है, यही आखिरी सवाल भी है। किसी भी पल में, किसी भी जगह पर, किसी भी इंसान के लिए क्या करना सही है?

एकदम ज़मीनी बात करेंगे। अध्यात्म को ऐसा नहीं बना लेना है कि बहुत दूर की हवा-हवाई बात है; एकदम ज़मीन की बात। कभी भी, किसी के लिए भी सही क्या होता है?

मैंने कहा है कि हम सब शुरू तो कर ही चुके हैं। हम सबकी ज़िंदगी में कितने मुद्दे हैं? एक ही है क्या? कभी कोई भी सूची बनाते हो, तो उसमें एक से आगे नहीं जा पाते क्या? कितने मुद्दे हैं जीवन में? बहुत सारे मुद्दे हैं न?

तो क्या करें? सबसे पहले ये देखना है कि दो तरह के मुद्दे हुए जीवन में, एक वो जो हमारी सूची में मौजूद हैं मुद्दों की तरह और दूसरे वो जो हमारी सूची में मौजूद ही नहीं हैं।

कुछ मुद्दे वो हैं ज़िंदगी में जिनको हम मानते हैं कि ये एक इशू (मुद्दा) है जिसपर विचार चाहिए। कोई चीज़ है जो हमें समस्या की तरह लगती है। कुछ है जो मन में घूमता रहता है। एक तो वो क्षेत्र है।

और दूसरा हिस्सा एक और भी हो सकता है—हमे स्वीकार करना चाहिए—कि मुद्दे हों तो, पर हमें पता ना हो। मुद्दा है तो, समस्या है तो, पर हमारे दिमाग में चलती नहीं है। हमे उसका ख्याल नहीं आता। हम उसके बारे में विचार नहीं करते, ठीक है?

इन दोनों क्षेत्रों की थोड़ी-सी जाँच-पड़ताल कर लेते हैं। जिन मुद्दों को हम बोलते हैं कि ये मेरे जीवन में मौजूद हैं, अब इनमें भी कुछ भेद, कुछ वर्ग हो सकते हैं, कौन-से? एक वो मुद्दे जो समस्या की तरह हैं, पर हम उनको समस्या मानते नहीं हैं। हम उनको कुछ और ही मानते हैं—कुछ दे रखे होंगे नाम; ये चीज़ ऐसी है, ये चीज़ वैसी है। तो उनकी मौजूदगी को कभी भी हम अवांछित, गैरवाजिब नहीं कहते। हमको लगता है कि जैसे वो चीज़ हमारी ज़िंदगी में रत्न की तरह है। किसी मूल्यवान वस्तु की तरह, बहार की तरह है।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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