ख़ास अनुभव की चाहत! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 17, 2022 | आचार्य प्रशांत

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्।
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति।।

जो उस (हिरण्यगर्भ रूप) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुखों से परे है, जो विद्वान उसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अनन्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १०)

आचार्य प्रशांत: हिरण्यगर्भ पर हमने पिछले सत्र में भी चर्चा करी थी। हिरण्यगर्भ माने? जगत की उत्पत्ति का कारण, प्रथम पुरुष। ठीक है? माने जगत की शुरुआत। हिरण्यगर्भ है किसके तल पर? जगत के ही तल पर। हिरण्यगर्भ फिर वह है जिससे समस्त नर-नारी, पशु-पक्षी और जड़-चेतन, जंगम-स्थावर सब कुछ प्रकट हुआ है। तो हिरण्यगर्भ इस संसार में सबसे पहला है लेकिन है वह अभी भी इस संसार में ही। संसार में पहला है लेकिन है संसार का ही। तो ब्रह्म को हिरण्यगर्भ से भी श्रेष्ठ कहा गया है। माने जो संसार में श्रेष्ठतम है उससे भी श्रेष्ठ है वह।

यह बात खासतौर पर उनके लिए है जो कहते हैं कि, "दुनिया में ही हम उच्चतम को पा लेंगे, या हमारी ऊँची-से-ऊँची उपलब्धि है वह संसार में ही हो जाएगी।" संसार में जो प्रथम है, हिरण्यगर्भ, ब्रह्म को उससे भी श्रेष्ठ कहा जा रहा है। तो तुम संसार में प्रगति करके कितनी दूर तक पहुँच जाओगे?

संसार में प्रगति करने का वास्तविक अर्थ समझो। संसार में प्रगति करने का वास्तविक अर्थ है संसार का उपयोग करके शनैः-शनैः संसार से मुक्त होते चलना। संसार को जानते चलना – यह है संसार में प्रगति। संसार में प्रगति का मतलब यह नहीं होता कि दो गाड़ियाँ नई खरीद लीं, कुछ और ज़्यादा पैसा आ गया है, पचास और लोग जानने लग गए हैं इत्यादि, इत्यादि।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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