कौन है सबका ज़िम्मेदार? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 20, 2022 | आचार्य प्रशांत

या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी।
तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥

पर्वत पर वास करने वाले सुखप्रदाता, हे रुद्रदेव! आपका कल्याणकारी, सौम्य, पुण्य से कांतिमान जो रूप है, आप हमें अपने उसी सुखदायी स्वरूप से देखें।

यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसी: पुरुषं जगत्‌॥

हे हिमालयवासी सुखदाता! जिस बाण को आप प्राणियों की ओर फेंकने के लिए हाथ में धारण किए रहते हैं, हे हिमालय रक्षक देव! आप उसे कल्याणकारी बनाएँ, इस जगत को, जीवसमूह को हिंसित न करें।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद्(अध्याय ३, श्लोक ५-६)

आचार्य प्रशांत: बहुत ध्यान से समझना पड़ेगा, नहीं फिर चूक होगी।

क्या कहा? पहली बात, "पर्वत पर वास करने वाले रुद्रदेव!" कैसे सम्बोधित किया है? 'तुम, जो पर्वतारुढ़ हो, चोटी पर विराजे हो, आपके अनेक रूप हो सकते हैं।' जब कहा जा रहा है कि 'आप हमें अपना एक विशिष्ट रूप दिखाएँ', तो निश्चित रूप से इसमें ये बात निहित है कि आपके अनेक रूप हो सकते हैं। हम आपसे प्रार्थना कर रहे हैं कि आप हमें अपना सुखदायी रूप दिखाएँ।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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