एक अनूठी तैराक, और महासागर का अकेलापन

November 25, 2020 | आचार्य प्रशांत

वो चार अलग-अलग महासागरों और आठ अलग-अलग समुद्रों में तैर चुकी हैं।

स्वर्गीय माननीय भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी जी ने उन्हें वाटर एडवेंचर के लिए Tenzing Norgay National Adventure Award से सम्मानित किया है।

वो अंटार्कटिक जल में खुली तैराकी में रिकॉर्ड स्थापित करने वाली पहली एशियाई महिला और दुनिया की सबसे कम उम्र की महिला हैं।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार! मेरा नाम भक्ति शर्मा है और कुछ महीनों पहले मेरा परिचय आचार्य जी से उनके यूट्यूब पर जो वीडियोज़ हैं, उनके माध्यम से हुआ। मन में कई सारे सवाल भी उठे जो पहले से थे, कुछ नए सवाल उठे और ये इच्छा जागी कि मैं वो सवाल आचार्य जी से स्वयं पूछूँ। आज मुझे उनसे बात करने का सौभाग्य हुआ, मुझे मौका मिला कि मैं आचार्य जी से स्वयं वीडियो कॉल के ज़रिये बात कर सकूँ और अपने सवाल पूछ सकूँ। मैं एक तैराक भी हूँ और २०१५ में काफी मुश्किल तैराकी की तैयारी के दौरान, जो कि आगे जाकर एक वर्ल्ड रिकॉर्ड तैराकी बना, उसकी तैयारी के दौरान मेरा परिचय ध्यान से हुआ और वहीं से मेरी आध्यात्मिक यात्रा, मेरी स्प्रिचुअल जर्नी की भी शुरुआत हुई। तो जो सवाल आज मैंने आचार्य जी से पूछे, वो मेरे उन्हीं अनुभवों से जुड़े हैं, मेरे जीवन के उन्हीं पहलुओं से जुड़े हैं और भी कई सारी चीज़ों से जुड़े हैं जो कि हर व्यक्ति के जो कि अध्यात्म के पथ पर चलता है, उनके मन में उठते हैं। मैं आशा करती हूँ कि मेरे जो सवाल थे, वो सिर्फ मुझ तक ही न रह जाएँ। जो भी इस पथ पर चल रहा है उन तक पहुँचे और जिस तरीके से मुझे आचार्य जी के जवाबों से मार्गदर्शन मिला है, वहीं मार्गदर्शन हर उस व्यक्ति तक पहुँचे जिनके मन में ये या कोई और सवाल उठते हों।

भक्ति शर्मा: नमस्कार आचार्य जी, बहुत ही अच्छा लग रहा है आपको देखकर और आपसे मिलकर।

आचार्य प्रशांत: मुझे भी। बताइये!

भक्ति शर्मा: ध्यान से मेरा परिचय कुछ पाँच या छः साल पहले हुआ और वो बहुत ही सांयोगिक था- मैं एक तैराक हूँ तो एक काफी मुश्किल तैराकी की तैयारी में मैं योग विद्या में तरीके ढूंढ रही थी कि जिससे मैं अपने शरीर की ठंड बर्दाश्त करने की क्षमता बढ़ा सकूँ, तो उसी दौरान 'पतंजलि योग सूत्र' और 'ऑटो बायोग्राफी ऑफ योगी' जैसी किताबों को मैंने ढूंढना चालू किया जिनमें सिद्धियों की बात की गयी है काफी ज़्यादा। मेरे पिताजी ने जब ये देखा तो मेरा परिचय एक व्यक्ति से कराया जिन्हें मैं अब गुरु बोलती हूँ तो उन्होंने मुझे कोई विधि तो नहीं दी योग की लेकिन क्योंकि वो खुद ओशो के संयासी हैं तो उन्होंने मुझे ध्यान की ओर बढ़ाया और बोला कि "ये सीडी है जिसमें उनका ४५ मिनट का रिकॉर्डेड मेडिटेशन था तो ये ध्यान करो और हर ध्यान के बाद मुझे फोन करके बस बताना कि क्या अनुभव हुआ?" तो इस तरीके से उन्होंने कोई उम्मीद नहीं बांधी मेरी ध्यान के साथ में- कि मुझे ऐसा महसूस होना चाहिए या अचानक शांति महसूस होना चाहिए। तीन साल पहले मैं यहाँ यू.एस. मूव हुई और यहाँ पर काफी लोगों से मैंने मिलना-जुलना चालू किया जो माइंडफूलनेस की और मेडिटेशन की बातें करते हैं लेकिन हमेशा उससे एक लक्ष्य जुड़ा हुआ होता है कि मैं ध्यान करता हूँ, या मैं माइंडफूलनेस की प्रैक्टिस करता हूँ क्योंकि उससे मेरा फोकस बढ़ता है मेरी एकाग्रता बढ़ती है। जबकि मेरा हमेशा से ध्यान के प्रति एक बहुत ही आध्यात्मिक दृष्टिकोण रहा है तो मेरा सवाल ये है कि पहली बात तो अध्यात्म क्या है? और क्या ध्यान को अध्यात्म से अलग किया जा सकता है? या व्यवहारिक और मानसिक बदलाव के लिए किया जाना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: देखो इंसान जैसा बना है न- तो हमारी सीधी-सादी प्राकृतिक वृत्ति, टेंडेंसी यही रहती है कि हम दुनिया को देखें-परखें। हमारा जो पूरा तंत्र है, हमारी इंद्रियाँ,सेंसेस, मन ये सब प्राकृतिक तौर पर इस तरीके से हैं कि हम दुनिया की खोज-खबर तो मजे में लेते रहते हैं। आँखों से दुनिया का पता चल जाता है, कोई चीज़ छूनी-पकड़नी है तो हाथ काम आ जाते हैं, किसी चीज़ के बारे में खोजबीन करनी है, उसकी जाँच-पड़ताल करनी है तो मन, बुद्धि काम आ जाते हैं, कोई बाहरी, पुरानी बात याद रखनी है तो बुद्धि, स्मृति ये सब काम आ जाते हैं। लेकिन हम इस तरीके से प्राकृतिक रूप से रचे नहीं गए हैं कि जो इन सब बाहरी चीज़ों को देख रहा है हम उसकी ओर ज़रा भी ध्यान दें, देखें या उसकी खोजबीन करें। ऐसा हमसे कभी भी प्राकृतिक रूप से, वृत्तिगत रूप से, इंस्टिंक्टिवली, इंट्यूटिवली होगा नहीं, बहुत कम संभावना है। आप किसी इंसान को यूँ ही छोड़ दीजिये, जिंदगी भर के लिए और आप ये उम्मीद करिये कि वो खुद ही अपने आप सवाल पूछेगा कि मैं हूँ कौन? ये मन में विचार, सोच, ख्याल, कहाँ से आते हैं? चेतना क्या है? मैं क्यों इधर-उधर देखता रहता हूँ? आंखों के पीछे क्या है? मन का स्रोत क्या है? ये सवाल वो खुद कभी नहीं पूछेगा।

हाँ, आप उसे अगर छोड़ दीजिये अकेला, बिना कुछ लिखाए-पढ़ाए- समझाए उसी के दम पर, तो वो ये सवाल जरूर पूछलेगा कि वो पेड़ क्या है? वो पत्ता क्या है? खाना बेहतर कहाँ से मिल सकता है? आग क्या है? पानी क्या है? मैं पत्थरों पर छलांग मार कर लांघ कैसे सकता हूँ? मैं नदी को तैर कर पार कैसे कर सकता हूँ? मैं बेहतर तरीके से घर कैसे बना सकता हूँ? ये सब सवाल वो खुद पूछ लेगा। आप उसे नहीं भी सिखाओ तो भी उसके पास सवाल रहेंगे जैसे एक छोटा बच्चा होता है, उसके पास कितने सवाल होते हैं? और आपने उससे कहा नहीं होता है कि तुम सवाल पूछो लेकिन वो कैसे-कैसे सवाल पूछता है? उसके सारे सवाल लेकिन संबंधित बाहरी दुनिया से ही होते हैं, तो इससे हमें ये पता चलता है कि हमारी वृत्ति क्या है प्राकृतिक रूप से? वृत्ति माने टेंडेंसी, हमारा झुकाव क्या है? छोटा बच्चा जैसे पूछ लेगा की फ्रिज क्या है? तो जो बड़ा बच्चा होता है चालीस साल वाला वो कह देता फ्रिज बेहतर तरीके से कैसे बनाया जा सकता है? फ्रिज में अगला नयापन क्या ला सकते हैं? रेफ्रिजरेशन टेक्नोलॉजी मैं अगला ब्रेक थ्रू क्या हो सकता है? लेकिन दोनों बात किसकी कर रहे हैं? फ्रिज की ही कर रहे हैं।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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