डॉक्टर हो या व्यापारी, इंस्टाग्राम क्वीन सब पर भारी || (2021)

July 29, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: मैं एक डॉक्टर हूँ, पिछले पाँच सालों से मैं देख रहा हूँ कि समाज में कुछ क्षेत्रों के लोगों के लिए इज़्ज़त एकाएक बढ़ गई है। आज कोई भी शिक्षकों को, प्रोफेसरों को, डॉक्टरों को इज़्ज़त या सम्मान या वैसी ही पापुलैरिटी (लोकप्रियता) और रिकॉग्निशन (पहचान) नहीं दे रहा है जिसके वो हक़दार हैं। मैं ये इस संदर्भ में बोल रहा हूँ कि कोरोना काल में डॉक्टरों ने बहुत प्रयत्न किए हैं, सैकड़ों डॉक्टरों की जान भी गई है, फिर भी मैं देखता हूँ कि बड़े शहरों में, छोटे शहरों में कई दफे डॉक्टरों पर हमला हो जाता है। उन्हें मारपीट दिया जाता है। जितने भी व्यवसाय पारंपरिक रूप से बौद्धिक क्षेत्र से संबंध रखते हैं, उनकी कीमत आज कम हो रही है। मतलब जिसमें ज्ञान चाहिए होता है, पढ़ाई चाहिए होती है, उनकी वैल्यू, उनकी कीमत आज कम हो रही है जैसे टीचर्स (शिक्षक), प्रोफेसर्स (प्राध्यापक), डॉक्टर्स (चिकित्सक) वगैरह। और साथ-ही-साथ इंस्टाग्राम इनफ्लुएंसर्स और यूट्यूबर्स और पॉडकास्टर्स और सिंगर्स (गायक), डांसर (नर्तक) ये सब भगवान बनते जा रहे हैं। मैं समझना चाह रहा हूँ ऐसा क्यों है?

आचार्य प्रशांत: जो बात है वो तो आपने ख़ुद ही यहाँ पर स्पष्ट कर ही दी है। समाज में ज्ञान के प्रति सम्मान बहुत तेज़ी से कम हो रहा है। देखिए हम इंसान हैं; इंसान दो चीज़ें होता है — निचले तल पर जो शारीरिक वृत्तियाँ हैं, बॉडिली टेंडेंसीज हैं, इंसान वो होता है। जैसे आप बोलें कि इंसान वो है जो खाता है; इंसान वो है जो चलता है; इंसान वो है जो पैदा होता है; इंसान वो है जो मरता है। एक तरीका ये है इंसान को परिभाषित, डिफाइन करने का, है न? और दूसरा तरीका ये है कि आप कहें इंसान वो है जो सोचता है; इंसान वो है जो समझता है; इंसान वो है जिसके पास ज्ञान होता है। ये दूसरा तरीका है इंसान को परिभाषित करने का।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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