सांख्य दर्शन और वेदांत में भेद

December 17, 2020 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: मेरे जीवन में सांख्य और वेदांत दर्शन के पढ़ने के बाद काफ़ी बदलाव आया है। मैं आभारी हूँ कि जो मुझे पढ़ने का अवसर मिला, परन्तु दोनों दर्शन में कुछ मूल विरोध दिखाई देता है। मेरे सम्मत में आप नहीं दिखते, आप में सांख्य और वेदांत एक होते दिखते हैं। सांख्य दर्शन कहता है कि प्रकृति और पुरुष दोनों अलग-अलग सत्ता है, दोनों ही नित्य है। अद्वैत वेदांत कहता है, “ब्रह्मा सत्य है, जगत मिथ्या है।” इस स्थिति में हम किसको अनुकरण करें, मेरा सवाल यही है।

आचार्य प्रशांत: दोनों अलग-अलग लोगों से कहते हैं। दोनों जो बात कह रहे हैं ना, अलग-अलग लोगों से कह रहे हैं।

सत्य अपने शुद्धतम रूप में कोई वाक्य, कोई सिद्धांत नहीं होता, अपने शुद्ध्तम रूप में तो सत्य अरूप है, मौन है। सत्य जब भी किसी शब्द, या वाक्य, या सिद्धांत के रूप में कह दिया गया, तो समझ लीजिए कि वो किसी व्यक्ति के लिए सच है, वो किसी मौके का सच है, वो किसी संदर्भ का सच है। अब वो मात्र सच नहीं है, अब वो परिस्थिति-सापेक्ष सत्य है, अब वो काल-सापेक्ष, संदर्भ-सापेक्ष सत्य है।

आप बात समझ रहे हैं मैं क्या बोल रहा हूँ?

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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