जो बात कोई बताता नहीं

February 12, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये तो साफ है कि जो वैश्विक समस्याऍं हैं, बड़ी समस्याऍं, जैसे ग्लोबल वॉर्मिंग (भूमंडलीय ऊष्मीकरण) या क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन), उनका कारण ये गलत खोज ही है, कि इंसान गलत जगह पर खोज रहा है। तो एक आइडियल वर्ल्ड (आदर्श विश्व) तो यही होगा कि ये खोज पूरी तरह से समाप्त हो जाए।

आचार्य प्रशांत: हाँ, जो चीज़ जहाँ है वहाँ पा लो। अब ऐसे समझो कि (सामने की ओर इशारा करते हुए) ये तुम्हारा लॉन (मैदान) है बाहर, ठीक है? और तुमने ज़िद पकड़ ली है कि अँगूठी तो यही पर है, क्यों? क्योंकि अगर तुमने ये ज़िद नहीं पकड़ी, तो तुम्हें ये मानना पड़ेगा कि ये अँगूठी और भी कही हो सकती है। फिर मेहनत करनी पड़ेगी ये पता करने के लिए कि अँगूठी कहाँ पर है।

लॉन अपना ही एक छोटा-सा क्षेत्र है, उसमें हमने ये कल्पना कर ली है, अपने-आपको बिल्कुल समझा दिया है कि इसी में है अँगूठी, ठीक है? ये सोच ही हमारे लिए बड़ी भयावह है कि अँगूठी लॉन में नहीं है। सोचो तो अब कितना श्रम करना पड़ेगा। लॉन में नहीं है तो अब कहीं भी हो सकती है। अब वो अज्ञात हो गई—और अज्ञात से हमें लगता है भय। लॉन में वो जब तक है, हमारे लिए वो क्या है? ज्ञात है। तो हम अपने-आपको बार-बार यही जताऍंगे कि अँगूठी लॉन में है।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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