क्या मूल अहम् वृत्ति ही देवी महामाया हैं? || दुर्गासप्तशती पर (2021)

January 3, 2022 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी तक जो विवरण रहा, उसमे ऐसा लग रहा है कि जैसे देवी जी कोई व्यक्तित्व हों और हमसे बाहर का कुछ हों, तो इसको मन के तल पर कैसे समझा जा सकता है?

आचार्य: देखो, आत्मा सत्य है, आत्मा का ही दूसरा नाम ब्रह्म है। आत्मा को आच्छादित किए हुए बड़े कोष हैं, उपनिषदों में पंचकोष की बात आती है न। आचार्य शंकर ने भी समझाया है, आप पढ़ चुकें है। एक दृष्टि है जो इनको देखती है धुएँ की तरह, आवरण की तरह जिसने आत्मा को ढक रखा है और दूसरी दृष्टि है जो इनको देखती है आत्मा की ही अभिव्यक्ति के रूप में, कि जैसे आत्मा ही अलग-अलग कोषों के रूप में अभिव्यक्त हुई हो।

तो आत्मा का जो पहला सगुण प्राकट्य है, वे देवी हैं। उन्हीं को महा प्रकृति कहते हैं। देवी, देवी मात्र। ये जो देवी हैं, ये आत्मा के इतने निकट और इतनी अभिन्न हैं कि अभी ये त्रिगुणात्मक भी नहीं हैं। जैसे आत्मा निर्गुणी होती है न, वैसे ही जो महादेवी हैं, जो महा प्रकृति हैं, जो मूल प्रकृति हैं, वो अभी त्रिगुणात्मक भी नहीं हैं। फिर वो आगे चल करके तीन गुणों में जैसे विभाजित हो जाती हों, जैसे अपने तीन रूप दिखाती हों। फिर वो तीन देवियों के नाम से जानी जाती हैं, तो सतोगुणी सरस्वती हो जाती हैं, रजोगुणी लक्ष्मी हो जाती हैं और तमोगुणी काली हो जाती हैं।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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