सामर्थ्य सीमित, पर लक्ष्य असीमित || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 15, 2022 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: क्या जीवन को उसकी उच्चतम संभावना में जीना ही ब्रह्म को पाना है? जीवन के पार भी कुछ है?

आचार्य प्रशांत: जीवन के पार कुछ भी नहीं है। ठीक है? बिलकुल इस भ्रांति से बाज आ जाइए कि अध्यात्म जीवन के पार या मृत्यु के पार इत्यादि किसी अन्य जीवन या लोक की बात करता है।

कोई परलोक वगैरह नहीं है, जो कुछ है यही है। यह मृत्यु लोक है, इसी मृत्यु लोक में मृत्यु के पार जाना है। चाहें तो लिख लें या स्मृतिबद्ध कर लें – मृत्यु लोक में ही मृत्यु को मात देनी है। मृत्यु को मात देने का यह नहीं मतलब है कि मरने के बाद कोई स्वर्ग वगैरह मिलेगा और वहाँ पर अमर होकर बैठे रहोगे हमेशा। पगला जाओगे! क्या वहाँ (जाओगे)? यही सही जगह है, जो करना है यहीं करना है। कूल एंड हैप्पनिंग सब यहीं हो रहा है।

अच्छा, ‘जीवन को उसकी उच्चतम संभावना में जीना', इसका क्या मतलब है? इसका बहुत बड़ा कोई मतलब नहीं है। उच्चतम का कोई बहुत बड़ा मतलब नहीं है। हमारे लिए किसका मतलब होना चाहिए? ग़ौर करिए, उच्चतर का। अभी जिस स्तर पर हो उससे उच्चतर स्तर पर चले जाओ। जहाँ तुम बैठे हो वहाँ बैठे-बैठे तुम उच्चतम की बात करोगे तो यह आडम्बर जैसा हो गया, शोभा नहीं देता न। जहाँ बैठे हो वहाँ बैठे-बैठे उच्चतम की बात करो, अच्छा लगता है क्या?

तुम कहाँ बैठे हो? तुम बैठे हो ज़िंदगी के तहख़ाने में। और वहाँ बैठकर तुम बात किसकी कर रहे हो? उस आसमान की जो तुम्हारी इमारत की सौवीं मंज़िल के भी पार है। और बैठे कहाँ हो ख़ुद? कतई तहख़ाने में घुसे हुए हो और वहाँ बैठकर बात किसकी करी? उच्चतम की। ऐप्सोल्यूटली, द हाईएस्ट की। ईमानदारी की बात है?

ईमानदारी की बात क्या है? ये रही सीढ़ी।


ap

आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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