राष्ट्रवाद: वेदांत के ज्ञान से सेना के सम्मान तक || आचार्य प्रशांत, सैनिकों को श्रद्धांजलि (2020)

November 23, 2020 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: मैं मूलतः बिहार से हूँ, पर पिछले पंद्रह वर्ष से दिल्ली में हूँ। मेरे छोटे बेटे ने अपनी अधिकांश शिक्षा दिल्ली से ली है, और अब वो दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहा है। हमारे पिताजी सेना में थे, युद्ध भी लड़े थे, और हमारे घर में फ़ौज और सेना की बड़ी इज़्ज़त रही है। पर अब पिछले कुछ साल से बेटा कहता है कि, "सरकारी या प्राइवेट नौकरी करने वाला एक आम कर्मचारी भी तो तनख़्वाह लेकर अपना काम करता है, और सैनिक भी तनख़्वाह लेकर अपना काम करता है, फिर सैनिक को अधिक सम्मान देने की क्या ज़रूरत है?"

बेटा कहता है कि, "सेना और राष्ट्र को लेकर लोग बेकार ही भावुक होते रहते हैं।" और वो मुझसे बहस करता है कि काम और काम में कोई अंतर नहीं होता, तो किसी एक काम को करने वाले को ख़ास महत्व या इज़्ज़त देना आवश्यक नहीं है। मुझे उसकी बातें बुरी तो लगती हैं, पर उसे समझाने के लिए मेरे पास कोई सटीक तर्क नहीं होता। कृपया मदद करें।

आचार्य प्रशांत: पहली बात तो ये जो प्रचलित मुहावरा है कि "काम और काम में कोई अंतर नहीं होता," ये बहुत उथला है, बिल्कुल भी ठीक नहीं है। इसको समझने की बहुत ज़रूरत है।

करने वाले के सामने हमेशा दो रास्ते होते हैं: सही काम करना और ग़लत काम करना। ऐसा काम करना जो बहुतों की मदद करेगा, और ऐसा काम करना जो सिर्फ़ अपने स्वार्थ के लिए हो। ऐसा काम करना जो ख़ुद को और दूसरों को मुक्ति की ओर, होश की तरफ़ ले जाता हो, और ऐसा काम करना जो ख़ुद को और दूसरों को बंधनों की ओर और बेहोशी की ओर ले जाता हो। तो काम और काम में अंतर तो होता ही है क्योंकि कर्ता की एक अवस्था और दूसरी अवस्था में अंतर तो होता ही है। आप प्रेम के भाव से एक काम कर रहे हैं, आप घृणा के भाव से एक काम कर रहे हैं, आपके मन की इन दोनों अवस्थाओं में अंतर है ना या एक ही हैं?

आपके दिमाग़ पर ईर्ष्या, द्वेष, किसी किस्म की हिंसा चढ़ी हुई है। इस समय आपका उद्देश्य ही एक है कि किसी तरह सामने वाले को नीचा दिखा दूँ, उसका नुक़सान कर दूँ—ये मन की एक हालत है। इस हालत में एक काम होता है। और मन की दूसरी हालत है जिसमें समझदारी है, करुणा है, दूसरे के हित का कुछ ख़याल है—ये मन की बिल्कुल दूसरी हालत है। इस दूसरी हालत में आप आदमी ही समझिए दूसरे हैं। तो मन की इन दो अवस्थाओं से निकलने वाले काम तो अलग-अलग होंगे ही।

इसी तरीक़े से एक आदमी जीवनभर करने के लिए जो भी काम चुनता है—जीवनभर करने के लिए या साल-दो-साल करने के लिए, एक क्षण ही करने के लिए, चुनाव तो चुनाव है। आप कोई काम चुनें दो मिनट करने के लिए, चाहे दो साल करने के लिए, चाहे बीस साल करने के लिए, तो ये जो आप काम का चुनाव करते हैं, ये भी मन की दो अवस्थाओं से हो सकता है ना? एक अवस्था ये होती है कि — "मैं क्यों ख़याल करूँ कि मैं करने क्या जा रहा हूँ और उसका पूरी दुनिया पर क्या असर पड़ेगा? मुझे तो बस अपना उल्लू सीधा करना है, मुझे तो बस अपना स्वार्थ नापना है।" तो नौकरी का चयन आप ऐसे भी कर सकते हैं। और नौकरी का, अपने काम का, अपने पेशे का चयन ऐसे भी करा जा सकता है कि आपके सामने ज़्यादा बड़ा विस्तृत आदर्श हो, और उस आदर्श की सेवा करने के लिए आपने वो काम चुना हो।

तो इसलिए ये ठीक नहीं है कि आप कह दें कि सब काम एक होते हैं, और किसी प्राइवेट कंपनी में कोई यूँ ही नौकरी कर रहा है, या कोई सरकारी नौकरी कर रहा है, या कुछ अपना काम-धंधा कर रहा है, और एक सैनिक है, इन सब के काम में कोई अंतर नहीं है, तो सैनिक को किसी सम्मान वगैरह की कोई ज़रूरत नहीं है। देखिए, सम्मान सभी का करा जाना चाहिए। लेकिन जैसे आदमी और आदमी में फ़र्क़ होता है, वैसे ही काम और काम, पेशे और पेशे में फ़र्क़ होता है। कुछ पेशे होते हैं इस क़ाबिल कि अगर उनको करने वाला ईमानदार है, तो वो एक विशेष सम्मान का पात्र होता है।

Share this article:


ap

आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

सुझाव