जिसे चाहते हैं हम चुपचाप

January 15, 2021 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: दुनिया में जो कुछ भी है, छोटा-बड़ा, उससे तुम जो भी संबंध बना रहे हो वो वास्तव में सच की ख़ातिर ही बना रहे हो। ये जो पूरा खेले ही चल रहा है, ये खेल एक परम सत्ता के आधार पर और एक परम सत्ता की लालसा में है। ये उसी से आ रहा है खेल और उसी की ओर जाने के लिए है। चाहे तुम रात में छत पर बैठकर के चाँद को देख रहे हो, चाहे तुम बाग के किसी छोटे फूल के साथ खेल रहे हो, चाहे तुम जीवन में अपने माता-पिता से संबंध बना रहे हो, चाहे अपनी पत्नी से बना रहे हो, अपने पति से बना रहे हो, अपनी बेटी से, अपने बेटे से संबंध रख रहे हो। तुम दुनिया में जो कुछ भी कर रहे हो - उसी से कर रहे हो उसी की ख़ातिर कर रहे हो।

बात समझ में आ रही है?

अब बताओ उसको भूलोगे कैसे? भूलते तो तुम उसे कभी भी नहीं हो, पर फिर भी भूले रहते हो। उसे तुम अगर भूल गए होते तो फिर तुम कुछ करते ही नहीं। तुम्हारा एक-एक कर्म उसी की ख़ातिर है माने लगातार वो तुमको याद है लेकिन फिर भी तुम बार-बार ये कहते हो कि "अरे! मैं तो नौकरी की ख़ातिर दफ्तर जाता हूँ।" नहीं, नौकरी की ख़ातिर नहीं जाते; अगर गौर से देखोगे कि किस वजह से तुम पैसा चाहते हो, ज़िंदा रहना चाहते हो, तो तुम्हें समझ में आएगा नौकरी का असली मकसद।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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