बेटा, किस क्लास में हो? गूगल करना नहीं आता? || (2021)

July 30, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: ग्लोबल-वार्मिंग (वैश्विक ऊष्मीकरण) तो पिछले सौ साल में भी नहीं पिछले पचास साल में ही ज़्यादा हुई है पर नॉन-वेज (माँसाहार) तो पंद्रह-हज़ार साल से खाया जा रहा है तो फिर आप क्यों बोलते हैं कि ग्लोबल-वार्मिंग और नॉन-वेज (माँसाहार) में कोई लिंक (संबंध) है?

आचार्य प्रशांत: बेटा, किस क्लास (कक्षा) में हैं आप? पहली बात तो जिसको आप नॉन-वेज (माँसाहार) बोल रही हैं वह सीधे-सीधे माँस है, तो हम उसे बोलेंगे — माँस। वह पंद्रह-हज़ार साल से नहीं खाया जा रहा, वह डेढ़-लाख साल से खाया जा रहा है, वह पंद्रह-लाख साल से खाया जा रहा है, वह डेढ़-करोड़ साल से खाया जा रहा है। कौन खा रहा था? खाने वाला जो था वह जंगल का प्राणी था। वह पूरे तरीके से प्रकृति के नियमों के अधीन था। जब वह प्रकृति के नियमों के अधीन था तो उसकी बहुत ज़्यादा तादाद, संख्या भी नहीं बढ़ी थी। वह प्रकृति के नियमों के अधीन था उसकी बहुत तादाद नहीं बढ़ी थी, वह जानवर था एक, और जानवर तब खाते थे, जानवर आज भी खा रहे हैं। आदमी भी जंगल में रहता था तो कुछ हद तक वह माँसाहारी था। यह भी मत कहिएगा कि आदमी जब जंगल में रहता था तो पूरी तरह से माँसाहारी था, पूरी तरह माँसाहारी नहीं था वह लगभग पूरी तरह शाकाहारी था।

Share this article:


ap

आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

सुझाव