एक-सौ-चालीस करोड़ लोग, और गोल्ड एक! || (2021)

August 10, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता आचार्य जी, आप हमेशा निगेटिव बात करते हैं। अभी आपने अपने 'बचपन का प्यार' वाले वीडियो में कहा कि "इन्डिया का यूथ (जवान पीढ़ी) फ़ालतू टिक-टॉक और रील्स बनाने में बिज़ी (व्यस्त) है, इसलिए इंडिया के ओलम्पिक मेडल्स नहीं आते" पर देख लीजिए कल ही नीरज चोपड़ा ने गोल्ड हासिल कर लिया, इण्डिया का यूथ किसी से कम नहीं।

आचार्य प्रशांत: कितनी आबादी है हिंदुस्तान की? एक-सौ-चालीस करोड़। एक-सौ-चालीस करोड़ लोग और मेडल एक? बड़ी नाइंसाफी है न!

और इस एक-सौ-चालीस करोड़ में से भी दुनिया की सबसे बड़ी यूथ पॉपुलेशन भारत में है — पचास करोड़ से भी ज़्यादा। ओलंपिक्स जवान लोगों का खेल है न? तो दुनिया में सबसे ज़्यादा जवान लोग हिंदुस्तान में पाए जाते हैं। जब सबसे ज़्यादा लोग हिन्दुस्तान में पाए जाते हैं, तो सबसे ज़्यादा गोल्ड और टोटल मेडल भी हिन्दुस्तान के ही होने चाहिए थे न?

एक गोल्ड आया, कुछ सिल्वर आए, कुछ ब्रॉन्ज़ आए। बहुत ख़ुशी की बात है। पर एक ही क्यों आया है? सबसे ज़्यादा तो हमारे आने चाहिए थे न? उसकी बात नहीं करना चाहोगे? एक पर ख़ुशी मनाई, बढ़िया किया, मनानी चाहिए। पर उनकी भी तो बात करो जो मेडल्स आने चाहिए थे पर आए नहीं, वो क्यों नहीं आए? आमतौर पर बहाना ये दे दिया जाता है कि साहब भारत एक गरीब देश है, इसलिए यहाँ पर मेडल्स नहीं आते और स्पोर्टिंग एक्सेलेन्स (खेल उत्कृष्टता) नहीं है।

युगांडा, इक्वेडॉर, क्यूबा, नाइज़ीरिया, बहामाज़, जमैका इनका नाम सुना है? ये जो मेडल तालिका है ओलंपिक्स की, इसको शुरू से लेकर के भारत के स्थान तक देखना, भारत का स्थान सैंतालिसवाँ है। तो एक से सैंतालीस के बीच में तुम्हें इन सब देशों के नाम मिल जाएँगे जो मैंने अभी बताए और ये सब-के-सब देश या तो भारत जितने ही गरीब हैं या भारत से भी कहीं ज़्यादा गरीब हैं।

कुछ अफ्रीकन देश हैं, कुछ वेस्ट-इन्डियन हैं, लैटिन अमेरिकन देश हैं; बहुत गरीब और बहुत छोटे देश हैं और पिछले पचास सालों, सत्तर सालों से लगातार भारत से कहीं ज़्यादा पदक ये हासिल करते रहते हैं। अपने-आपसे पूछना नहीं चाहोगे क्या?

तो गरीबी तो वजह नहीं है। कोई और ही वजह होगी न? हमने दो बातें कही, पहला — इतनी आबादी है हिंदुस्तान की, उसमें भी सबसे ज़्यादा जवान लोगों की आबादी है भारत में। तो पदक भी उसी हिसाब से आने चाहिए थे। क्यों नहीं आएँ हैं? और अगर तुम ये जवाब दोगे कि "साहब! हमारे पास रिसोर्सेस नहीं हैं, पैसा नहीं है इसलिए मेडल्स नहीं आते" तो मैंने जिन देशों के नाम बताए उन देशों को देख लो। वो भारत से भी ज़्यादा गरीब हैं। वो इतने मेडल्स कैसे ले आते हैं? ज़रूर कहीं कुछ गड़बड़ तो कर रहा है न हिन्दुस्तान का जवान आदमी? बात गरीबी की नहीं है।

मेरे पास जब यूरोपियन्स ने आना शुरू किया तो उसमें सबसे पहले जो लोग आए थे वो एक देश है बहुत छोटा-सा ‘इस्लोवेनिया’ करके। ज़्यादातर लोगों ने उसका नाम ही नहीं सुना होगा। यूरोप में एक बहुत छोटा देश है ‘इस्लोवेनिया’। कुल बीस लाख की उसकी आबादी है। कुल बीस लाख की आबादी है और अभी मेडल तालिका को देखोगे तो उनके अभी तीन या चार गोल्ड मेडल हैं, हमेशा रहते हैं। कैसे हो गया भाई ये?

ऑस्ट्रेलिया जो कि टॉप पाँच में रहता है मेडल तालिका में, लगातार रहता है। कभी पाँच पर, कभी छः पर, कभी और ऊपर आ जाता है। ऑस्ट्रेलिया की कुल आबादी दिल्ली एन.सी.आर. से कम है। इसी तरह से इज़राइल है, नब्बे लाख कुल आबादी है उसकी। ये देश कैसे इतने मेडल्स ला लेते हैं?

ठीक है, इज़राइल है या ऑस्ट्रेलिया है, इस्लोवेनिया है, इनके पास पैसा है। तो हमने पहले ही उन दशों की भी बात कर ली जिनके पास पैसा नहीं है फिर भी मेडल्स ला रहे हैं। जिनके पास पैसा है वो भी मेडल्स ला रहे हैं, जिनके पास पैसा नहीं है वो भी मेडल्स ला रहे हैं, भारत के ही मेडल्स क्यों नहीं आ रहे हैं?

और उस पर तुर्रा ये कि जहाँ इस देश का जवान वर्ग गलती कर रहा है, उस गलती को छुपाने के लिए तुम नीरज चोपड़ा के गोल्ड मेडल का बहाना और सहारा ले रहे हो।

नीरज चोपड़ा को बधाईयाँ मिलनी चाहिए, बिलकुल मिलनी चाहिए, हक़दार है वो। मीराबाई चानू को मिलनी चाहिए, पी. वी सिन्धु को मिलनी चाहिए, बजरंग पुनिया को मिलनी चाहिए, भारतीय हॉकी टीम को मिलनी चाहिए। भारतीय हॉकी टीम ने इतने दिनों बाद कांस्य पदक जीता, मैंने सबसे पहले ट्वीट करके उनको बधाईयाँ दीं।

लेकिन इनको मिलनी चाहिए सिर्फ। जो ये देश का आम युवा वर्ग है, ये भी तो अपने-आपसे पूछे कि, "हम क्या कर रहे हैं?" मैंने जो वीडियो बनाया था, जिसका तुमने यहाँ पर ज़िक्र किया है 'बचपन का प्यार' वाला, उसमें मैंने और क्या बोला था? मैंने यही तो बोला था कि जिन देशों में बहुत गरीबी है और बहुत गरीबी के साथ बहुत कम आबादी है, वहाँ के भी जवान लोग अपने-अपने कामों में मेहनत करके एक्सेलेंस (उत्कृष्टता) हासिल कर लेते हैं।

और जो हिन्दुस्तान का टीनेजर (किशोर) है या जवान आदमी है, वो देखो किन चीज़ों में व्यस्त है? नाच-गाना, फूहड़, अश्लीलता, भौंडापन, इन चीज़ों में व्यस्त है। और अब तुम अपने-आपको जस्टिफाई (सही साबित) करने के लिए और डिफेंड करने के लिए कह रहे हो “नहीं साहब, नीरज चोपड़ा का गोल्ड आ गया तो इस देश में जितने जवान लोग, जितनी भी भद्दी हरकतें करते हैं वो सब जस्टिफाई (सही साबित) हो गईं।"

वो कैसे जस्टिफाई हो गईं? नीरज चोपड़ा एक्सेप्शन (अपवाद) है और अंग्रेजी में कहते हैं एक्सेप्शन ओनली प्रूव्स दा रूल (अपवाद केवल कोई नियम सिध्द करता है)। नीरज चोपड़ा को जब देखो तो सवाल पूछो कि इतने बड़े देश में वही एक क्यों इतना शानदार प्रदर्शन कर पाया, बाकी लोग क्यों नहीं कर पाए? और ये सवाल पूछा जाना ज़रूरी है।

जल्दी से ये बोलना मत शुरू कर दो कि हम भी तो अब स्पोर्टिंग सुपर पॉवर हो गए क्योंकि हमारे भी कुल सात पदक आ गए। ये सात पदक क्या होते हैं? आज से आठ साल पहले भी तुम छः (पदक) ला रहे थे, कौन-सी बहुत बड़ी बात हो गई? खुद ही अपनी पीठ थपथपा रहे हो। और ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि भारत की आबादी अगर चीन जितनी है तो भारत की मेडल तालिका भी चीन जितनी होनी चाहिए।

जो लोग एक गोल्ड पा लेने पर इतने खुश हुए जा रहे हैं, उनमें अब भूख और प्यास कहाँ रह जाएगी, जज़्बा कहाँ रह जाएगा अपने आपको चालीस गोल्ड्स तक ले जाने का? भारत और चीन की आबादी लगभग बराबर है। चीन क्यों हमसे दस गुना, सौ गुना आगे है स्पोर्ट्स में? उनके आँकड़ें देखो, अपने आँकड़ें देखो। एक जब गोल्ड आता है तो वो सवाल उठाता है कि बाकी सारे गोल्ड्स कहाँ हैं? बात समझ में आ रही है?

तो अपने आपको जस्टिफाई करने के लिए उस एक बन्दे का सहारा लेना मत शुरू कर दो जिसने मेहनत करी है, कामयाबी हासिल करी है। उसकी कामयाबी उसके साथ है। और ये सब जो बाकी लोग घूम रहे हैं, तुम अपना भी तो कुछ बताओ। समझ में आ रही है बात?

कम से संतुष्ट हो जाना, अपनी जगह पर पड़े-पड़े सड़ जाने का फ़ॉर्मूला होता है। और यहाँ पर तो संतुष्टि भी नहीं है, यहाँ पर तो बेईमानी है। तुम कह रहे हो कि तुम जैसी ज़िन्दगी जी रहे हो बिलकुल ठीक है क्योंकि नीरज चोपड़ा ने गोल्ड पा लिया। अरे भाई नीरज चोपड़ा ने गोल्ड पा लिया इससे ये कैसे साबित हो जाता है कि इस देश का युवा वर्ग जैसी ज़िन्दगी जी रहा है, जैसी हरकतें कर रहा है, जैसा एटीट्यूड (नज़रिया) रख रहा है, वो सब जायज़ है? बधाई मिलेगी तो उस एक को मिलेगी न? तुम कैसे जस्टिफाइड साबित हो गए?

अभी बहुत दूरी तय करनी बाकी है, हिन्दुस्तान को सबसे ऊपर होना चाहिए। चीन में भी जितने जवान लोग हैं उससे डेढ़ गुना जवान लोग भारत में हैं। और अभी तीस-पैंतीस साल पहले तक चीन की प्रति व्यक्ति आय, पर कैपिटा इनकम भारत जितनी ही हुआ करती थी, सन उन्नीस-सौ-छियासी तक। तो चीन ऐसा भी नहीं है कि वो सदियों से हमसे बहुत आगे रहा है। आज चीन कहाँ बैठा है, आप कहाँ बैठे हुए हैं? बात शर्म की और घबराहट की होनी चाहिए। उसकी जगह आप एक गोल्ड मेडल का सहारा लेकर के अपने मुँह मिया मिट्ठू बन रहे हैं।

मैं फिर कहता हूँ — बड़ी-से-बड़ी बधाई के पात्र हैं वो एथलीट जिन्होंने भारत के लिए पदक जीता। लेकिन उनके पदक का गलत इस्तेमाल मत करो अपने तौर-तरीकों को जायज़ साबित करने के लिए, क्योंकि हमारे तौर-तरीके, जो युवा वर्ग है भारत का उसका एटीट्यूड, उसकी जो पूरी विचारधारा है, उसका जो मानसिक संस्कार है वो कहीं से भी ठीक नहीं है।

और दो-चार लोगों का उदाहरण मत ले आना कि, "नहीं देखिए उसका एक नाम, दो नाम।" एक-दो नाम बताने से नहीं होगा, मैं पूरी आबादी की बात कर रहा हूँ कि पूरी आबादी क्या कर रही है? एक्सेप्शन के, अपवादों के नाम मत गिनवाने लग जाओ। ये बेईमानी हो जाती है।

प्र२: आचार्य जी, फिर इसका समाधान क्या है? किस तरह से और गोल्ड आ सकते हैं इंडिया के पास?

आचार्य: देखो जैसा अभी मैंने कहा भी कि समस्या पैसे या फंड्स से कहीं ज़्यादा एटीट्यूड और कल्चर की है। अगर बात ये होती कि हिन्दुस्तान में गरीबी, बेरोजगारी इतनी ज़्यादा है तो बेचारे जवान लोग कैसे स्पोर्ट्स की तरफ जाएँ, तो हमने अभी जिन गरीब देशों का नाम लिया, इतने सारे अफ़्रीकी देश हैं जिनकी आबादी भी ज़्यादा नहीं है और गरीबी भी बहुत है, वो फिर कहाँ से ला पाते मेडल?

तो निश्चित रूप से जो बात है वो ज़्यादा हमारी संस्कृति की है। स्पोर्टिंग कल्चर नहीं है हमारे यहाँ और युवाओं में स्पोर्ट्स के प्रति सही नज़रिया, सही एटीट्यूड नहीं है। कुछ खेल ऐसे होते हैं जिसमें महँगा फीजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर (आधारभूत भौतिक संरचना) चाहिए होता है — टेनिस हो गया, स्क्वाश हो गया। स्विमिंग भी, उसमें भी चाहिए होता है।

लेकिन बहुत सारे खेल ऐसे होते हैं जिनमें आपको बहुत इंफ्रास्ट्रक्चर (आधारभूत संरचना) नहीं चाहिए, जिसमें बस आपको रुझान चाहिए कि मुझे तो खेलना है। जैसे एथलिटिक्स है। सौ मीटर की दौड़ है, चार-सौ मीटर की दौड़ है, इसमें आपको कौन सा इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए? दौड़ ही तो लगानी है, या चाहिए भी इंफ्रास्ट्रक्चर तो बाकि खेलों की अपेक्षा कम चाहिए।

अब जो खाली समय है उस समय पर एक जवान आदमी बैठकर के क्या बना रहा है? या क्या देख रहा है? बेहूदा, फूहड़, फ़िल्मी आयटम नम्बर्स पर भद्दे डांस। और ये देखते-देखते वो छह घण्टे निकाल दे रहा है।

इसके बजाय कहीं बेहतर नहीं होगा क्या कि वो जाकर के मैदान में दौड़ लगा ले? या जैसे सॉकर है, सॉकर में भी जो अफ़्रीकी देश हैं वो बहुत अच्छी परफॉर्मेंस (प्रदर्शन) देते हैं। तुम लोग देखते होगे जब फुटबॉल वर्ल्ड कप आता है। उसमें हमेशा अफ्रीका के कुछ देश होते हैं और वो हर बार कुछ अपसेट्स भी करते हैं। वो टॉप यूरोपियन टीम्स को भी हरा देते हैं।

वो कैसे कर लेते हैं? उनके पास बहुत पैसा तो है नहीं। बस बात इतनी-सी है कि उनके बच्चे नंगे पाँव लगे होते हैं फुटबाल खेलने में। उनके बच्चे नंगे पाँव फ़ुटबाल खेलने में लगे हैं, और वो गरीब बच्चे ही हैं पर उनके पास खाली समय है तो वो क्या कर रहे हैं? फ़ुटबाल खेल रहे हैं। हमारे यहाँ पर एक गरीब बच्चे के पास खाली समय है तो वो क्या कर रहा है? वो टिकटॉक देख रहा है और उसमें फालतू गाना गा रहा है और इसी बात पर उसको प्रसिद्धि भी मिली जा रही है।

इसी तरह से स्कूलों में जो पी.टी. पीरियड होता है उसको सबसे फालतू पीरियड समझा जाता है। कई बार तो ऐसा होता है कि कोई और क्लास बाकि रह गई थी तो वो पी.टी. पीरियड में करा दी जाएगी। पी.टी. माने फिज़िकल ट्रेनिंग की जो पीरियड होती है उसमें करा दी जाएगी।

स्कूलों का भी रवैया ये रहता है स्पोर्ट्स के प्रति कि ये (खेल) तो सबसे फ़ालतू की चीज़ है। 'पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब और खेलोगे कूदोगे तो होओगे ख़राब’।

तो उसमें जो चीज़ सरकार अपनी ओर से कर सकती है वो तो ठीक ही है कि स्टेडियम बनाए जाएँ, कोचिंग सुविधाएँ दी जाएँ लेकिन मैं समझता हूँ कि पहले नंबर पर जिस चीज़ की ज़रूरत है वो है —चेंज इन कल्चर (संस्कृति में बदलाव)।

अब वीकेंड्स का समय है, ऐसे लोग जो नौकरी कर रहे हैं उनके पास वीकेंड में खाली समय होता है। अगर आपके पास वीकेंड में खाली समय है तो आप कुछ खेल क्यों नहीं रहे? या आपकी नई जॉब लगी है कैम्पस के बाद से, शाम को आप खाली हो, आपके पास करने को कुछ नहीं है, आप सात बजे, आठ बजे घर आ गए हो, खाना-वाना खा करके नौ बजे के बाद आप खाली हो, नौ बजे के बाद बैठकर के आप टी.वी क्यों देख रहे हो भई? बैडमिंटन खेल लो।

देखो मैं नहीं कह रहा हूँ कि जॉब के साथ जो बैडमिंटन खेल रहा है वो बैडमिंटन का लांडेन बन जाएगा या पी.वी सिंधु बन जाएगी वो लड़की। लेकिन एक बंदा जब मेडल लाता है तो उस एक प्लेयर के पीछे बहुत सारे नॉन-प्लेयर्स का होना बहुत ज़रूरी है। समझिएगा इस बात को।

एक बंदा चैम्पियन बन सके इसके लिए उसके पीछे दस-बीस, सौ या हज़ार नॉन-प्लेयर्स का होना ज़रूरी है, जो सिर्फ मौजूद हैं एक कल्चर बनाने के लिए, एक माहौल बनाने के लिए।

भई जब हज़ार लोग बैडमिंटन खेलेंगें तब न उसमें से एक चैम्पियन निकलेगा और सोचो अगर कोई बैडमिंटन नहीं खेल रहा है, एक ही अकेला बंदा है जो बैडमिंटन खेल रहा है तो वो भी कितनी दूर तक आगे जा पाएगा? तो एक मास लेवल पर एक तादात होनी बहुत ज़रूरी है लोगों की जो खेल रहे हैं। कि वीकेंड आया तो क्या करना है साहब? खेलना है। रात हो गई है, क्या करना है? खेलना है।

बाहर भी और कहीं जा रहे हैं तो गाड़ी पर एक साइकल पीछे बाँध कर ले जा रहे हैं कि साईकिलिंग करेंगें। पहाड़ों पर जा रहे हैं तो ये नहीं कर रहे हैं कि गाड़ी लेकर के पहाड़ पर चढ़ गए। या चढ़ भी गए गाड़ी लेकर के तो उसके बाद ट्रेकिंग करेंगें। वो कल्चर होना ज़रूरी है।

और उस कल्चर की जगह मैं देख रहा हूँ कि जो मेरा जवान लड़का है या लड़की है वो बैठे-बैठे बस बेकार के बेहुदे गाने देख रहा है और इस तरह की अपनी शूटिंग कर रहा है और जिससे सिर्फ उसका दिमाग ख़राब होना है, ज़िन्दगी ख़राब होनी है। तो ये बड़े खेद की बात हो जाती है न।

देश में एक कल्चर होना चाहिए कि अगर आप खाली हो तो आप खेल रहे हो। और मैं नहीं कह रहा हूँ कि जितने जवान लोग हैं सब खेलना ही शुरू कर दें अपने खाली समय में। कुछ लोग खाली समय में लिखेंगें, कुछ खाली समय में पढ़ेंगें, कुछ खाली समय में गाएँगे भी, कुछ खाली समय में कोई म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट सीख सकते हैं। कुछ लोग खाली समय में हो सकता है कि यात्रा करना, ट्रेवल करना पसंद करें। जो भी करो अपने खाली समय में, लेकिन बैठे-बैठे अब तुम देखे जा रहे हो टीवी और टीवी में भी फालतू कचरा देख रहे हो — ये बेहूदी बात है।

आज के ये जो प्रश्नकर्ता हैं इन्होंने भी तो इसी बात पर उंगली उठाई है कि आप बार-बार देश के जवान लोगों को डाँटते रहते हो कि तुम लोग बेहूदी चीज़ों में अपना समय बिता रहे हो। मैं बिलकुल डाँटता हूँ। ज़रूरी नहीं है कि आप खेलो लेकिन आप जो कुछ भी करो, वो चीज़ कायदे की तो होनी चाहिए न।

छोटे बच्चे तुम उठा लाते हो और उनसे तुम फ़िल्मी गीतों पर भद्दा डांस (नाच) कराते हो, ये बात कैसे उचित हो सकती है? तुम इसे कैसे जस्टिफाई करोगे? उस बच्चे की ज़िन्दगी ख़राब कर दी तुमने। उस बच्चे के दिमाग में कचरा भर दिया तुमने। इससे अच्छा कहीं ये है कि चलो वो बच्चा कवि बनना चाहता है, पेंटर बनना चाहता है तो तुम उसके हाथ में ब्रश दे दो या कलम दे दो और अगर तुम्हें दिखाई दे कि वो बच्चा खेलने में भी रुचि रखता है तो उसको फिर जूते दे दो, उसके हाथ में रैकेट दे दो। जितनी भी आपकी आर्थिक गुंजाइश होती है उतना आप उसके लिए करिए। और उस चीज़ को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

तो मैंने कहा समाधान दो तरफ है — सरकार को फंड्स देने होंगे, सरकार को इन्फ़्रास्ट्रक्चर देना होगा, स्टेडियम बनाने होंगे, ट्रैक्स बनाने होंगे और कोचेज़ की व्यवस्था करनी होगी, कोचिंग बहुत ज़रूरी है। ये काम सरकार का है, लेकिन मैं कह रहा हूँ — सरकार का जो काम है उससे ज़्यादा ज़रूरी काम है कल्चर का। और युवाओं में सही एटीट्यूड हो, ये ज़्यादा ज़रूरी है। तो ये कल्चर और एटीट्यूड वाली जो चीज़ है वो इन्फ्रास्ट्रक्चर और फंड्स से भी ज़्यादा ज़रूरी है। ये समाधान है।


ap

आचार्य प्रशांत

कोई उन्हें अद्वैत वेदांत का समकालीन सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि कह सकता है। कोई उन्हें किसी भी परम्परा से पूर्णत: परे सहज आत्मज्ञानी कह सकता है। समान रूप से, कोई उनके चरित्र में ज्ञान की अपेक्षा करुणा, प्रेम और श्रद्धा का आधिक्य देख सकता है। लेकिन उन्हें जानने का सबसे उपयुक्त तरीका है उनके काम को देखना। अधिक जानें

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