सबकुछ भगवान कर रहा है, या कोई और?

May 4, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम ये बात करते हैं कि बेड़ियाँ काटनी हैं या पुराने ढर्रों से बाहर निकलना है। तो जैसा कि आपने गीता के सत्र में कहा था कि जब कृष्ण कहते हैं कि, "या तो मेरी सुन ले या मेरी माया की सुन ले।" तो हमें ऐसा कर्म करना चाहिए जो हमारे बंधनों को काटे। तो मेरा सवाल ये है कि क्या हमारे पास वो इंडिपेंडेंट चॉइस (स्वतंत्र विकल्प) है भी वो कि वो कर्म करें जो वो बंधन काटे, क्योंकि अल्टीमेटली (अंततः) करवा तो कृष्ण ही रहे हैं न?

आचार्य प्रशांत: तो फिर ये सवाल पूछना ही बेकार है। क्यों पूछ रहे हो अगर तुम्हारे पास चॉइस (विकल्प) ही नहीं है तो? जिसके पास चॉइस ही ना हो वो कौन हुआ?

वो ये हुआ ये (चाय के कप को दिखाते हुए)। मैंने उठाया तो उठ गया, मैंने गिराया तो गिर गया। इसके पास अपनी कोई चॉइस, कोई सत्ता, कोई विकल्प, कोई एजेंसी नहीं है। ये (कप) सवाल पूछे तो मैं जवाब दूँ? तो मैं क्यों जवाब दूँ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि विकल्प है, पर विकल्प का खतरा ना उठाना पड़े इसलिए हम ऐसा स्वांग करना चाहते हैं कि "मैं क्या करूँ, मेरे पास तो चॉइस है ही नहीं?"

वही! "मैं क्या करती देवदास, मैं मजबूर थी, मेरे पास चॉइस नहीं थी देवदास।"

काहे 'पारो' (देवदास फ़िल्म की नायिका) बन रहे हो?

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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