बाहर सत्य के दर्शन होना || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 26, 2022 | आचार्य प्रशांत

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखमा्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥

वह परमपुरुष सब जगह हाथ-पैर वाला, सब जगह आँख, सिर और मुख वाला और सब जगह कानों वाला है, वही लोक में सबको व्याप्त करके स्थित है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय ३, श्लोक १६)

आचार्य प्रशांत: जो मूल औपनिषदिक सिद्धान्त है इस श्लोक के पीछे वो स्पष्ट होना चहिए। सारा जगत, स्थान का सारा प्रसार, समय का पूरा विस्तार मन है। मन क्यों है? क्योंकि मन अपनी सामग्री के अलावा कुछ नहीं होता। मन में जो कुछ मौजूद है मन उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। और मन में समय और स्थान के अलावा और कुछ मौजूद होता नहीं।

मन को कभी भी परखिएगा, जाँचिएगा तो उसमें आपको भूत और भविष्य मिलेंगे, और उसमें आपको दुनियाभर के तमाम व्यक्ति मिलेंगे, वस्तुएँ मिलेंगी, घटनाएँ मिलेंगी, जगह मिलेंगी; यह सब समय और स्थान के अंतर्गत आते हैं। तो जो कुछ भी देखा जा सकता है, जो कुछ भी सोचा जा सकता है, दुनिया में जो कुछ भी है, कभी था, कभी आगे होगा, जो तथ्यरूप में मौजूद है या जिसकी कल्पना की जा सकती है, वो सब कुछ मन है।

तो यह हुआ सिद्धान्त का पहला हिस्सा − संसार मन है। मन में संसार के अतिरिक्त कुछ होता नहीं, और मन जैसा है उसी अनुसार वो संसार को देखता है, प्रक्षेपित करता है, संसार के अर्थ करता है। मन और संसार एक हैं।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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