तुम्हारी चाहत में जान कितनी है? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 20, 2022 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। क्या चेतना और सत्य भिन्न हैं? ये विवेक क्या होता है?

आचार्य प्रशांत: हमारी चेतना अशुद्ध चेतना होती है। उसका लक्ष्य होता है सत्य। तो हम जैसे हैं, जीव की जो स्थिति होती है, उसमें चेतना और सत्य बिलकुल भी एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।

सत्य अद्वैत होता है, चेतना लगातार द्वैत में काम करती है। सत्य में पूर्णता होती है, चेतना हमेशा आधी-अधूरी होती है। सत्य निष्काम है, चेतना में हमेशा इच्छा है, कामना है। लेकिन चेतना पहुँचना सत्य तक ही चाहती है क्योंकि उसमें जो दोष है, अशुद्धि है, उसमें जो विकार मिला हुआ है उसके कारण वह कष्ट में रहती है। वह कष्ट ही उसको फिर प्रेरित कर सकता है सत्य तक जाने के लिए।

तो पहली बात तो चेतना और सत्य को एक ना समझा जाए। हाँ, विशुद्ध चैतन्य और सत्य एक होते हैं। लेकिन यह बड़े अहंकार की बात हो जाएगी कि हम जैसे हैं, हमारा जैसा मन है और हमारी जैसी चेतना है, उसी को हम सत्य बोल डालें।

चेतना क्या है? यह भाव कि 'मैं हूँ और संसार है; और मैं संसार का दृष्टा हूँ, मैं संसार का अनुभोक्ता हूँ'। 'मैं हूँ संसार में'। यही चेतना है, कोई उसमें लंबी चौड़ी जटिलता नहीं। 'संसार है, मैं हूँ'। 'यह मेज़ है, मैं बैठा हुआ हूँ, यह मेरा शरीर है, शरीर पर मैंने कपड़े पहन रखे हैं, मेज़ मंच पर रखी है, मंच ज़मीन पर बना हुआ है, यहाँ लोग बैठे हैं', यह सब क्या है? चेतना।

दरवाज़ा खुला, कोई अंदर आ गया, यह क्या हुआ? चेतना में किसी का प्रवेश हो गया। ऐसा नहीं है कि इस कमरे में ही किसी का प्रवेश हुआ है, चेतना में प्रवेश हो गया क्योंकि उस व्यक्ति का आपने संज्ञान लिया, उस व्यक्ति का आपने अनुभव लिया। तो वो इस कमरे में ही नहीं आया, वो आपकी चेतना में भी आ गया।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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