अकेले चलने में डरता क्यों हूँ?

February 7, 2014 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: इतना मुश्किल क्यों होता है अकेले चलना?

आचार्य प्रशांत: मुश्किल होता नहीं है, पर लगने लग जाता है क्योंकि तुमने आदत बना ली है बैसाखियों पर चलने की, सहारों पर चलने की। यह कोई तथ्य नहीं है कि मुश्किल होता है अकेले चलना। उसमें वस्तुतः कोई कठिनाई नहीं है। पर मन ने एक छवि बना रखी है जैसे कि अकेले चलना बड़ा मुश्किल हो।

मैं एक चित्र देख रहा था जिसमें एक बड़ा हाथी एक पतली-सी रस्सी से, पतली-सी टहनी से बँधा हुआ दिखाया गया था। मैं उसको देर तक देखता रहा, फिर मैंने कहा, "ये हम ही तो हैं!" जानते हो होता क्या है? जब ये हाथी बच्चा था तब उसको उस रस्सी से, उस टहनी से बाँधा गया था। तब वो नहीं भाग पाया। तब उसने कोशिश करी थी एक दिन, दो दिन, दो हफ्ते, चार हफ्ते, तब उसको ये भ्रम हो गया कि शायद यही जीवन है, शायद ऐसे ही जीया जाता है, शायद इससे कोई छुटकारा ही नहीं है। और आज वो हाथी पूरा बड़ा हो गया है। इतनी-सी उसे कोशिश करनी है और वो मुक्त हो सकता है। पर वो कभी मुक्त नहीं हो पाएगा क्योंकि उसका मन अब ग़ुलाम हो गया है। अब उसके लिए मुक्ति सम्भव ही नहीं है क्योंकि मन हो गया है ग़ुलाम।

वही हाल हमारा हो गया है। तुम्हें तुम्हारी टाँगे दी गई हैं, तुम्हारी दृष्टि दी गई है, तुम्हें तुम्हारी समझ दी गई है, और इन सबमें तुम किसी पर आश्रित नहीं हो। और अच्छी-खासी अब तुम्हारी उम्र हो गई है, प्रकृति भी चाहती है कि तुम मुक्त जियो, पर आदत कुछ ऐसी बन गई है अतीत से कि अकेले चलते हुए ही डर लगता है। समझ रहे हो न बात को?

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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