देव-असुर संग्राम और हज़ारों साल की तपस्या का हमारे लिए क्या अर्थ है? || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

January 7, 2022 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: तो दुर्गा सप्तशती के दूसरे चरित्र का हम आरम्भ करते हैं। और जो ये दूसरा या मध्यम चरित्र है, इसमें अध्याय दो, तीन और चार सम्मिलित हैं। और इस चरित्र की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी हैं। ठीक वैसे जैसे प्रथम चरित्र की अधिष्ठात्री देवी महाकाली थीं।

तो क्या होता है इसमें? आरम्भ होता है देवासुर संग्राम से। बड़ा लम्बा संग्राम है जो सौ वर्षों तक चलता है। ये जो देव-दानव संग्राम की कथा है, ये हमें लगातार मिलती है, पुराणों में, महाकाव्य, इतिहासों में। तो ये क्या है?

व्यक्ति के भीतर ही कुछ ऐसा है जो सच्चाई की ओर जाने के लिए आतुर रहता है और व्यक्ति के भीतर ही कुछ ऐसा है जो निरंतर सत्य के विरोध की स्थिति में रहता है। आपकी ही आतंरिक वृत्तियाँ और अज्ञान जिनका दावा रहता है कि वो सच्चाई और दैवीयता के बिना भी प्रसन्न रह लेंगी, ताकतवर रह लेंगी, ये आपकी दानवीयता हुई। और आपकी ही वृत्तियों का वो रुझान जो आपको सच की ओर ले जाता है वो दैवीयता हुई।

तो जो निरंतर हमसे कहा जाता है कि देव और दानव आपस में संघर्षरत हैं, वो वास्तव में मनुष्य के भीतर का ही संघर्ष है आतंरिक।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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