परमात्मा किस प्रकार सब में व्याप्त है? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 13, 2022 | आचार्य प्रशांत

एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः।
स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः॥

वही एक परमात्मा सम्पूर्ण दिशाओं — अवान्तर दिशाओं में संव्याप्त है, वही सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ रूप में प्रकट हुआ था, वही सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड में अन्तःस्थित है, वही इस जगत रूप में उत्पन्न हुआ है और भविष्य में भी उत्पन्न होने वाला है, वही सम्पूर्ण जीवों में स्थित है और सम्पूर्ण पक्षों वाला है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय २, श्लोक १६)

आचार्य प्रशांत: ये पढ़ना आना चाहिए। पढ़ोगे नहीं ठीक से, सही विधि से, तो लाभ नहीं होगा। श्वेताश्वतर उपनिषद् प्रमुख उपनिषदों में से है, करोड़ो-अरबों लोगों ने इसका पाठ किया होगा, सबको नहीं लाभ होता क्योंकि एक विशेष दृष्टि से, एक विशिष्ट विधि से इसको पढ़ना होता है। समझो विधि क्या है — "वही सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ रूप में प्रकट हुआ था।" ठीक है?

अच्छा, तुम अपने-आपको क्या मानते हो? शरीर हो, ठीक है। तो तुम शरीर हो तो तुम किनसे आए हो? शरीरों से आए हो। वो किनसे आए? तो अगर तुम शरीर हो तो पहला भी कौन था? अपने ही तर्क पर चलो, एक तरह का मैथेमैटिकल इंडक्शन। तुम शरीर हो अगर तो तुम शरीर से ही आए हो, तुम्हारे माँ-बाप भी शरीर, वो शरीर तो उनके माँ-बाप भी शरीर और सब शरीर, शरीर, शरीर। तो जो पहला है वो भी शरीर। यहाँ कहा जा रहा है, 'नहीं, जो पहला है वही सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ रूप में प्रकट हुआ था।'

उसको कह दिया कि वो पहला है कौन? जो अशरीरी है। तुम अगर अपने-आपको शरीर मानो तो ये ज़रूरी हो जाता है कि जो पहले है वो भी शरीर ही हो। यहाँ कह दिया गया है, 'नहीं, जो पहला है वो अशरीरी है।' अगर पहला अशरीरी है तो तुम भी क्या हुए? अशरीरी, ये है बात।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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