रिहाई ही है आपकी असली भलाई || आचार्य प्रशांत (2021)

March 10, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता (प्र): आचार्य जी, जैसे हमारी संस्कृति है, सनातन धर्म है वो कहता है कि सबसे पहले जीवन में धर्म होना चाहिए और जब धर्म होगा तो उसी से फिर अर्थ, काम और मोक्ष भी होगा। जैसे मेरे व्यक्तिगत जीवन में सत्य बोलना धर्म है, तो सामान्य और व्यापक रूप से यह धर्म क्या है, जिसे जीवन में लाना ज़रूरी है?

आचार्य प्रशांत (आचार्य): देखिए, ध्यान ही धर्म है। ये जो आपने चार पुरुषार्थों की बात करी: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष; ये बात बहुत गहरी नहीं है। आपने संस्कृति की बात करी, संस्कृति भी कोई बहुत महत्वपूर्ण चीज़ नहीं है धर्म के सामने। हमें चूँकि इनके मायने स्पष्ट नहीं है तो इसीलिए हम धर्म और संस्कृति की बात एक ही साँस में कर जाते हैं। धर्म और संस्कृति नहीं होता और न जैसा आपने कहा कि हमारी संस्कृति हमें धर्म के बारे में सिखाती है, न संस्कृति धर्म से पहले आती है। धर्म ही प्राथमिक है। और क्यों प्राथमिक है, उसकी वज़ह कोई परम्परागत नहीं है। उसकी वज़ह बहुत तथ्यगत है। तथ्यगत बात ये है कि पहला और निर्विवाद तथ्य आप हैं।

एकदम सीधी-सी चीज समझिएगा: आपके लिए पहला तथ्य क्या है इस संसार का? आप हैं। आप कहें कि ये (रुमाल) तथ्य है, तो भी उससे पहले क्या चीज़ तथ्य हुई? आपकी आँखें जो उसको देख रही हैं। कुछ भी जो आप देख रहे हैं वो झूठ हो सकता है, पर आप झूठ भी देख रहे हैं तो भी आप तो होंगे। कम-से-कम अपनी नज़र में तो आप हैं। हैं न? तो आप हैं तो कौन है? ये शरीर तो तब भी होता है जब आप सो रहे होते हैं। पर उस समय न तो आप सवाल पूछ रहे होते, न संसार की बात कर रहे होते, न कुछ। तो आप हैं का अर्थ होता है चेतना है। तो पहला तथ्य हमारा क्या है? चेतना।

साथ चल रहे हैं सब लोग? हमारा पहला तथ्य है चेतना। हमें देखिए विश्वासों और मान्यताओं से शुरूआत नहीं करनी है। हमें उस चीज़ से शुरुआत करनी है जो निर्विवाद है, इन्‌डिस्‌प्‍यूटब्‌ल्, अकाट्य, जिस पर कोई बहस हो ही नहीं सकती।

दो लोग बहुत मुद्दों पर बहस कर सकते हैं। हो सकता है उनमें किसी भी मुद्दे पर सहमति न हो। पर दोनों एक बात पर जरूर सहमत होंगे कि दोनों हैं: मैं हूँ और तुम हो, आई एक्सिस्ट एंड यु डू। ठीक है? इस मुद्दे पर तो दोनों मानेंगे न? बाकी हो सकता है हर चीज़ में उनकी आपस में लड़ाई हो जाए, इस मुद्दे पर तो कोई बहस नहीं कर सकते। तो यही एकमात्र तथ्य है जिससे अध्यात्म में शुरुआत होती है कि मैं तो हूँ। अब बाकी कुछ क्या है, क्या नहीं है, कैसा है इसकी जाँच-पड़ताल करेंगे। पर साहब हम तो हैं। हम हैं माने क्या? हमने कहा सोते हुए हम को ‘हम’ नहीं बोलते। मुर्दा भी हम को ‘हम’ नहीं बोलते। मैं किसको बोलते हो आप? यही जो जाग्रत अवस्था में है; अभी जैसे बैठे हो।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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