ऊँचा उठने को तैयार हो?

February 24, 2021 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत (आचार्य): ग्रंथों का श्लोक हो, गुरुओं का आप्त वाक्य हो, किसी ज्ञानी का आर्ष वचन हो, कभी भूलना नहीं है कि उसमें कुछ भी आपके ज्ञान की बढ़ोत्तरी के लिए नहीं कह दिया जाता; उसमें कुछ भी इसलिए नहीं कह दिया जाता कि आपको संसार के बारे में कोई और कहानी पता चल जाए। चाहे विषय सांसारिक हो, चाहे काल्पनिक, अध्यात्म का उससे कोई केंद्रीय संबंध नहीं हो सकता। अध्यात्म का केंद्रीय संबंध सिर्फ़ और सिर्फ़ जो प्रार्थी है, जो शिष्य है, जो जीवात्मा है, उसके मन से है।

बहुत आगे निकल जाने पर बहुधा ये ख़तरा हो जाता है कि हम भूल जाते हैं कि हम कहाँ से चले थे, किस भाव से चले थे। हम क्यों आए थे उपनिषद् के पास? हम इसलिए तो नहीं आए थे कि हमको पता चले कि देवों की उत्पत्ति कैसे होती है, कितने देव हैं, उनके क्या नाम हैं, वो कैसे आगे बढ़े, किन दानवों से उनका द्वंद हुआ, किन क्षेत्रों का उन्होंने अधिग्रहण करा; तुम इसलिए तो नहीं आए थे न उपनिषदों के पास?

फिर से याद करो बिलकुल, उपनिषद् के पास आए ही क्यों थे? क्यों आए थे? क्योंकि हम अशांत थे इसलिए हम उपनिषद् के पास आए। हम उपनिषदों के पास अपने सामान्य-ज्ञान अथवा अपने धार्मिक ज्ञान में वृद्धि के लिए नहीं आए हैं; जीवन तो हमारा यूँ ही तमाम तरह के किस्सों से, धारणाओं से भरा ही हुआ है न? ये कोई बात हुई कि धर्म-ग्रंथों के पास भी आ रहे हो, और वहाँ से और कहानियाँ पकड़ लीं?

तो ये मूल सिद्धांत कभी छोड़ना नहीं है: मैं परेशान हूँ मैं इसलिए धर्म-ग्रंथ के पास आया हूँ, और उपनिषद् मुझसे जो कुछ कह रहे हैं वो इसीलिए कह रहे हैं कि मेरी परेशानी शांत हो; तो इस पूरे वक्तव्य के और इस पूरे प्रयास के केंद्र पर मैं और मेरा आंतरिक कोलाहल बैठा हुआ है।

तो श्लोक में फिर जो भी बात कही जाएगी, चाहे बात रुद्र की हो, चाहे देवताओं की हो, चाहे हिरण्यगर्भ की हो, ब्रह्मा की हो, फिर हम बार-बार पूछते रहेंगे, “इसमें मैं कहाँ हूँ? रुद्र कौन? देवता कौन है? हिरण्यगर्भ की बात क्यों हो रही है? अरे भाई! मैं तो उपनिषदों के पास इसलिए आया हूँ क्योंकि मुझे चैन की नींद नहीं आती, मैं दुविधा में पड़ा रहता हूँ, भविष्य की चिंता है, अतीत की स्मृतियाँ कचोटती हैं, चारों तरफ़ से असुरक्षा है; मैं तो उपनिषद् के पास इसलिए आया था। मुझे ये क्यों नए-नए प्रसंग, नए-नए नाम दिए जा रहे हैं?"

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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