लम्बा जीवन क्यों जिएँ?

January 13, 2021 | आचार्य प्रशांत

इस संसार में कर्म करते हुए ही (मनुष्य को) सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। हे मानव! तेरे लिए इस प्रकार का ही विधान है, इससे भिन्न किसी और प्रकार का नहीं है। इस प्रकार कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करने से मनुष्य कर्म में लिप्त नहीं होता।

~ ईशावास्य उपनिषद्, श्लोक 2

आचार्य प्रशांत (प्रश्न पढ़ते हुए): प्रणाम सर, उपनिषद् के ऋषि सौ वर्ष जीने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, पर कई महापुरुष जैसे स्वामी विवेकानंद, आचार्य शंकर आदि बहुत कम आयु में ही गुज़र गए। स्वामी विवेकानन्द, जिनसे मैं बहुत प्रेरित हूँ, उनके बारे में कहा जाता है कि वो समाधि के समय कई व्याधियों से भी ग्रस्त थे। तो मेरा प्रश्न यह है कि महापुरुष, उपनिषद् की इस ऋचा का अनुपालन करते क्यों नहीं दिखते? मान लिया जाए कि वो मुक्ति को प्राप्त भी हो चुके थे, फिर भी अपने मिशन(अभियान) के फैलाव हेतु ही सही उन्हें और जीने की इच्छा क्यों नहीं थी?

आचार्य प्रशांत (उत्तर देते हुए): उपनिषद् के ऋषि कह रहे हैं कि संसार में कर्म करते हुए और कर्मफल की इच्छा से लिप्त हुए बिना सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करो।

अब सौ वर्ष तक क्यों जीना है? सौ वर्ष तक जीना मात्र जीने के लिए तो नहीं हो सकता, अन्यथा तो आयु एक संख्या मात्र होती है, कोई बीस वर्ष जिया, कोई पचास, कोई सौ। अमर तो सौ वर्ष जीने वाला भी नहीं हो गया। सौ हो, या बीस हो, या पचास, सत्तर, ये सब तो संख्याएँ, आंकड़ें मात्र हैं। तो सौ वर्ष जीने के लिए प्रेरित क्यों कर रहे हैं ऋषि? इसलिए कर रहे हैं क्योंकि सामान्य आदमी को लम्बा समय चाहिए मुक्ति को पाने के लिए।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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