धर्मग्रंथों की उपेक्षा धर्म को मिटाने की तैयारी है

November 28, 2020 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आध्यात्मिक और धार्मिक ग्रंथों को लेकर वर्तमान समय में एक उपेक्षा का भाव है बल्कि कहीं-कहीं तो घृणा का। लोग कहने लग गए हैं ज्ञान तो हम अपने अनुभव से ही ले लेंगे। समझ तो हम अपने जीवन से यही सींख लेंगे। किसी ग्रंथ किसी शास्त्र की हमें कोई ज़रूरत नहीं है। बल्कि कई लोगों ने तो ज़ोर देकर बोलना शुरू कर दिया है कि किसी भी तरह की आध्यात्मिक पुस्तक पढ़ना आंतरिक प्रगति में बाधा ही बन जाती है।

आचार्य प्रशांत: देखिए वजह साफ हम जैसे जी रहे हैं वैसे जी नहीं पाएंगे अगर हम चले गए उपनिषदों और गीताओं के पास। साथ ही साथ हम में इतना दम नहीं है कि हम कह सके हम पाशविक हैं और हमें पशु जैसा ही भौतिक जीवन जीना है। इरादे भले ही हमारे यही है कि हमें पशु जैसा ही बस पार्थिव जीवन जीना है लेकिन यह बात हम खुलकर नहीं कह सकते। हमें यह भी खुद को और दुनिया को जताना है कि देखो साहब हमारी जिंदगी में भी कुछ ज़रा ऊपरी तल का है, हम भी आध्यात्मिक हैं। हमें यह भ्रम भी कायम रखना है साथ भी साथ हमें अपने ढर्रे भी कायम रखने हैं।

आज के समाज की आप स्थिति समझ रहे हैं? काल का कुछ ऐसा दुर्योग बैठा है, समय ने कुछ ऐसी करवट ली है, एक ऐसे मुकाम पर पहुँच गया है, जहाँ ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई दंड नहीं मिलेगा, कोई प्रतिफल नहीं मिलेगा अगर आप पूरे तरीके से एक सत्यहीन, मुक्तिहीन, भोग केंद्रित और सुख केंद्रित जीवन बिता रहे होंगे। तो हर आदमी की प्रकट या अप्रकट कामना यही है कि वो भोगे। वही कामना जो जानवर की भी होती है बस जानवर से कई गुना ज़्यादा परिमाण में। जानवर थोड़ा ही भोगना चाहता है भोगने के अलावा उसके जीवन का कोई लक्ष्य आदि नहीं होता।

आदमी जानवर से हज़ारों-अरबों गुना ज़्यादा भोगना चाहता है लेकिन कर वही रहा है जो जानवर करता है, आयाम वही है। आज के आदमी की बात कर रहा हूँ। जानवर को भी सुख चाहिए और आज का भी जो पूरा जीवन है, जो हमारी पूरी व्यवस्था है, संस्कृति और सभ्यता है, वो सिर्फ और सिर्फ सुख और भोग केंद्रित है। सबकुछ इस तरीके से बनाओ चाहे वो कानून हो, चाहे शिक्षा हो, चाहे अर्थव्यवस्था हो, चाहे सामाजिक व्यवस्था हो कि आदमी के सुख में बढ़ोत्तरी हो और आदमी को ज़्यादा से ज़्यादा चीज़ें भोगने को मिलें। नये-नये अनुभव भोगने को मिले। ये वर्तमान समय है। और साथ ही साथ हममें इतनी दिलेरी नहीं है कि हम कह सके कि हाँ साहब हम जानवर के ही आयाम पर आ चुके हैं वैसा ही हमको जीना है तो जरा अपनी नैतिक छवि बनाए रखने के लिए, ज़रा अपनी ही आँखों में ऊँचा बने रहने के लिए हम ये भी कहते हैं कि "हम आध्यात्मिक हैं।"

लेकिन असली अध्यात्म हमारे लिए खतरनाक है क्योंकि असली अध्यात्म हमें वैसे जीने नहीं देगा जानवर की तरह जैसे हम जी रहे हैं और यह कह पाने की हम में हिम्मत नहीं है कि कह दें कि मुझे अध्यात्म चाहिए नहीं मैं तो जानवर हूँ। ये कह पाने की न हम में ईमानदारी है न दिलेरी। तो हम कहते हैं कि "हम आध्यात्मिक हैं और अध्यात्म चाहिए लेकिन साथ ही साथ मुझे अपने भौतिक भोगवादी और सुखवादी तौर-तरीके सब जारी रखने हैं।" तो आज का युग विशेष है बहुत ख़ासतौर से पिछले 50 सालों का और उसमें भी ख़ासतौर से पिछले बीस सालों का।

एक बिल्कुल ही नया अध्यात्म खड़ा हो रहा है या कह लीजिए कि एक नए धर्म की ही स्थापना हो रही है, जो बड़ा चोर धर्म है। उस धर्म के पास यह हैसियत नहीं है बोल पाने की "कि मैं एक अलग और नया धर्म हूँ! तो वह दिखाता यही है कि मैं पुराना ही धर्म हूँ।

अगर हम हिंदू धर्म या सनातन धर्म की बात करें तो कोई नहीं मिलेगा आज के समय में जो कह रहा हो मैं एक नए धर्म की, पंथ की स्थापना कर रहा हूँ। उसके लिए बड़ी ईमानदारी चाहिए, उसके लिए एक अंदरूनी आश्वस्ति चाहिए और उसके लिए बड़ी श्रद्धा चाहिए न? जिन लोगों ने सनातन धर्म की नई शाखाएँ, नई धाराएँ निकाली वो बड़े वीर लोग थे। जिन्होंने भी धार्मिक सुधार कार्यक्रम चलाए वो भी बड़े निश्छल लोग थे। जिनकी नियत साफ़ थी। जो कह रहे थे धर्म में, गड़बड़ आ गई है, समय का कूड़ा-करकट भर गया है। जैसे किसी भी धारा में, समय बढ़ने पर गंदगी आ जाती है सफ़ाई ज़रूरी है। तो उन्होंने फिर नई धाराएँ चलाई थीं। वो लोग दूसरे थे, उन्होंने साफ़ बताया कि हम एक नई धारा चला रहे हैं क्योंकि उनकी नियत साफ़ थी। उन्हें कुछ छुपाने की ज़रूरत नहीं थी।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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